
ब्लॉगजगत से अंशकालिक विराम लेने से पूर्व गांधीजी के विचारों पर जारी चर्चा को एक खुबसूरत मोड़ पर लाकर छोड़ना ही उचित समझता हूँ। क्या कभी हममें से किसी ने सोचा कि मुन्नाभाई एम. बी. बी. एस. जैसी ताजगी भरी, उम्दा और सफल फिल्म बनाकर विधु विनोद चोपडा और राजकुमार हिरानी की जोड़ी ने गांधीजी की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म ही क्यों बनाई ! मुन्नाभाई जैसी साफ़-सुथरी, पूरे परिवार के साथ देखे जा सकने वाली और अत्यंत सफल फिल्में हिंदी सिनेमा में कम ही बनती हैं. ऐसे में इस टीम के समक्ष अपनी सफलता को दोहराना और वो भी बिना किसी समझौते के एक बड़ी चुनौती थी। फिल्म की सफलता से एक हद तक तो समझौता किया जा सकता होगा, मगर इसके स्तर से समझौते की कोई गुंजाईश नहीं रही होगी. ऐसे में इस टीम को गांधीजी की याद का आना स्वाभाविक ही था। गांधीजी आज भी इस देश में एक ऐसा नाम है, जिस पर आम आदमी की काफी श्रद्धा है। गांधीजी के विचारों को आमआदमी तक उसीकी शैली में पहुँचाने में जहाँ यह फिल्म काफी सफल रही, वहीँ इसने गांधीजी को बौद्धिक और बोझिल चर्चाओं से मुक्ति भी दिलाई।
इसी मन्त्र में रहस्य छुपा है फिल्म की सफलता और गांधीजी के विचारों की सार्थकता का। गाँधी विचार को बौद्धिक परिचर्चा की चारदीवारी से बाहर निकाल आमजन तक सरल लहजे में पहुँचाना ही इस देश को नए सिरे से एक सूत्र में पिरोने, वास्तविक भारतप्रेम जागृत करने में सहायक सिद्ध होगा।
आज गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनके मार्ग को सफलतापूर्वक अपना कई लोगों का जीवन बदल देने वाले कई अल्पचर्चित चेहरे उन्हीं से उर्जा पा रहे हैं। अन्ना हजारे, राजेन्द्र सिंह, बहुगुणा, बाबा आप्टे जैसी कई महानात्माएं है - जिन्होंने साबित कर दिया है कि गांधीजी के विचार सदा सर्वदा प्रासंगिक रहेंगे, बस उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में आम जनता तक पहुँचाने की जरुरत है।
इस पोस्ट के माध्यम से ऐसे ही सच्चे और सार्थक प्रयासों को नमन करता हूँ।

