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Friday, June 11, 2021

7 जून: महात्मा गांधी का प्रिटोरिया में आत्मसाक्षात्कार की रात

1893 की 7 जून ही वह तारीख़ थी जब नियति ने मोहनदास करमचंद गांधी को अपने जीवन के वास्तविक अर्थ की तलाश में आगे बढ़ने को प्रवृत्त किया था, या यूं कहें कि उन्हीं की मान्यतानुसार ईश्वर ने अपने काम के लिए उन्हें चुन लिया था।

एक दुबला-पतला कमजोर व्यक्ति, धार्मिक एवं अन्य मानसिक बेड़ियों में जकड़ा हुआ भी, एक साम्राज्यवादी देश के उपनिवेश के सामान्य से निवासी ने शायद ही कभी सोचा हो कि उसे जीवन में कभी इतनी बड़ी भूमिका भी निभानी होगी। शासक मुल्क की श्रेष्ठता से प्रभावित वह भी तो उसकी भाषा, तौर-तरीके, रंग-ढ़ंग सीखने की ही कोशिश कर रहा था। उस समाज में शामिल होने के लिये आवश्यक गुणों को सीखने के प्रयास का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया ही है।


बैरिस्टर बन कर उसे महसूस हुआ होगा कि वो अब उस वर्ग के और करीब आ गया है। लेकिन हमेशा ट्रेन के फर्स्ट क्लास में सफ़र करने वाले इस युवा वकील को टिकट और सारे अधिकार रहते प्रिटोरिया में जो अनुभव हुए उसने इस साम्राज्य के प्रति अब तक की धारणा को पूरी तरह बदल दिया।



वो समझ गए कि शासक और शासित में जमीन-आसमान का अंतर है, उनके रंगभेद की भावना कपड़ों और डिग्री के आधार पर भी कोई अंतर नहीं देखती। उनके लिए सभी काले सिर्फ काले हैं और कुछ नहीं।


मेरी नज़र में तो यह रात उनकी समाधि और आत्ममंथन की रात थी। इस रात उनके जीवन में वह प्रकाश आया जिसमें उन्हें अपने जीवन को आगे ले जाने की दिशा मिली।


अपनी आत्मकथा में इस पल को याद करते हुए उन्होंने लिखा कि-
मैंने अपने धर्म का विचार किया : ' या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए , नहीं तो जो अपमान हों उन्हें सहकर प्रिटोरिया पहुँचना चाहिए और मुदकमा खत्म करके देश लौट जाना चाहिए । मुकदमा अधूरा छोड़कर भागना तो नामर्दी होगी । मुझे जो कष्ट सहना पड़ा है , सो तो ऊपरी कष्ट है । वह गहराई तक पैठे हुए महारोग का लक्षण है । यह महारोग है रंग - द्वेष । यदि मुझमें इस गहरे रोग को मिटाने की शक्ति हो , तो उस शक्ति का उपयोग मुझे करना चाहिए । ऐसा करते हुए स्वयं जो कष्ट सहने पड़ें सो सब सहने चाहिए और उनका विरोध रंग - द्वेष को मिटाने की दृष्टि से ही करना चाहिए । '
लक्ष्य के प्रति निश्चय तो वो कर ही चुके थे मगर नियति ने उन्हें शासकों की मानसिकता से परिचित करवाने के और भी अवसर रख छोड़े थे।


चार्ल्सटाउन से जोहान्सबर्ग जाते उन्हें घोड़ागाड़ी से जाना था, जिसमें फिर एक बार एक 'कुली' को अन्य यात्रियों के साथ बैठने नहीं दिया गया। उन्हें कोचवान की बगल में बाहर बैठाया गया। इसके बाद भी जब घोड़ा गाड़ी के गोरे अधिकारी को सिगरेट पीने और बाहर की हवा खाने की तलब लगी तो उसने उनसे कोचवान के पैरों के पास बैठने को कहा। इसे उन्होंने स्वीकार करने से इंकार कर दिया। बदले में उन्हें गालियों के साथ बुरी तरह से मारा भी गया, इतना कि अन्य यात्रियों को दया आ गई। यात्रियों की आलोचना ने गोरे को इतना आक्रोशित कर दिया था कि वो उन्हें आगे मजा चखाने की धमकी देता रहा और इधर गांधी जी को यह आशंका हो रही थी कि वो जिंदा मक़ाम तक पहुंच सकेंगे भी या नहीं...!


इन अनुभवों ने रंगभेद और इससे अन्य हिंदुस्तानियों की पीड़ा को समझने के लिए उन्हें और संवेदनशील बनाया। यहां से उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तो आया पर यह भी गौरतलब है कि अपनी, पीड़ा, आक्रोश और क्रोध को उन्होंने मात्र कुछ लोगों से बदला लेने में खर्च नहीं कर दिया, जबकि एक वकील के रूप में भी वो ऐसा कर सकते थे। उन्होंने इसे एक बड़ा रुप दिया। अंग्रेजों से व्यक्तिगत द्वेष न रखते हुए उन्होंने उनके साम्राज्यवादी और रंगभेद नीति का विरोध किया। ट्रेन के तीसरे दर्जे में बैठने को भी उन्होंने प्रतीकात्मक प्रतिरोध का माध्यम बना दिया।


आज उनकी आलोचना इसलिए भी आसान है क्योंकि वैसे किसी आदमी के होने की कल्पना भी वाकई मुश्किल है...

Wednesday, March 17, 2021

दांडी मार्च पर भ्रामक प्रचार और गांधी जी की स्पष्टता

ब्रिटिश हों या कोई भी वर्ग गांधी जी उसकी मनःस्थिति को समझते हुए उसके मानसिक धरातल पर उतर कर उसकी आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करते थे। नमक आंदोलन चूंकि अंग्रेजी शासन से असहयोग की दिशा में पहला बड़ा कदम था इसलिए इसके राजनीतिक प्रभावों को लेकर लोगों के पृथक मत भी थे। ऐसे ही एक मत के रूप में मौलाना शौकत अली ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन स्वराज्य प्राप्ति का नहीं बल्कि मुसलमानों के खिलाफ हिंदू राज्य स्थापित करने का आंदोलन है और इसलिए मुसलमान इससे अलग ही रहें। खबर पढ़ गांधी जी ने उनसे तार के माध्यम से पुष्टि मांगी और मिलने पर इस आंदोलन पर एक गंभीर आरोप के निराकरण का प्रयास किया। यह प्रयास एक आंदोलन को सर्वस्वीकार्य बनाने, सभी की भागीदारी सुनिश्चित करवाने के प्रयास को दर्शाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन न तो हिंदू राज्य की स्थापना के लिए है न मुस्लिमों के खिलाफ। नमक जैसी सामान्य किन्तु सर्व महत्व की सामग्री को एक आंदोलन का माध्यम बनाने की दूरदर्शिता इससे भी झलकती है कि नमक का इस्तेमाल सभी करते हैं और इसपर कर का प्रभाव भी सभी पर पड़ता है। इसी तथ्य को रेखांकित करते उन्होंने कहा कि इस कर का विरोध करने से किसी की हानि होने वाली नहीं है, परंतु यदि यह विरोध सफल हुआ तो इसका लाभ सभी को समान रूप से मिलेगा। हाँ, इस आंदोलन में भाग लेने का अधिकार सभी का है। मौलाना साहब द्वारा उनपर तीखी टिप्पणी का भी स्पष्ट प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण बात कही। 'यंग इंडिया' में अपने एक लेख के माध्यम से उन्होंने कहा कि- "जहां तक खुद मुझसे मौलाना साहब की चिढ़ की बात है इसके संबंध में मुझे ज्यादा-कुछ कहने की जरूरत नहीं है। चूंकि मेरे मन में उनके प्रति कोई चिढ़ नहीं है, इसलिए मैं यह भविष्यवाणी करता हूं कि जब उनका क्रोध शांत हो जाएगा और वे देखेंगे कि उन्होंने मुझे जिन अनेक दोषों का भागी माना है उनका दोषी मैं नहीं हूं तो वे फिर मुझको 'अपनी उसी जेब' में रख लेंगे जिस जेब में रहने का सौभाग्य मुझे मानो अभी कल तक प्राप्त था। क्योंकि उनकी जेब से मैं खुद बाहर नहीं आया हूँ। उन्होंने ही मुझे उसमें से निकाल फेंका है। मैं तो आज भी वही नन्हा-सा आदमी हूं जो 1921 में था। अंग्रेजों के प्रतिनिधियों ने हमारे खिलाफ जो ढेर सारे अन्याय किए हैं उस ढेर में अंग्रेज लोग भले ही और भी वृद्धि कर डालें, किन्तु मैं उनका शत्रु नहीं बन सकता। इसी प्रकार मैं मुसलमानों का भी दुश्मन कभी नहीं बन सकता, चाहे उनमें से कोई एक या बहुत-से लोग मेरे अथवा मेरे लोगों के साथ चाहे जैसा व्यवहार करें। मनुष्य की कमियों से मैं इतनी अच्छी तरह वाकिफ हूं कि किसी भी आदमी के खिलाफ, चाहे वह कुछ भी करे, मेरे मन में चिढ़ हो ही नहीं सकती। मेरा उपचार तो यह है कि जहां-कहीं बुराई दिखाई दे, उसे दूर करने की कोशिश करूँ और जिस प्रकार मैं नहीं चाहूंगा कि मुझसे बार-बार जो गलतियां होती हैं उनके लिए कोई मुझे चोट पहुंचाए उसी प्रकार से मैं खुद भी बुराई करनेवालों को चोट पहुंचाना नहीं चाहूंगा।

Monday, March 15, 2021

दांडी यात्रा की वर्षगांठ

आजादी की 75 वीं सालगिरह पर आयोजित 'अमृत महोत्सव' की शृंखला में पूरे देश में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे। इस कड़ी में मेरा भी एक अंशदान गांधी जी, दांडी यात्रा और आजादी के आंदोलन से जुड़े कुछ और विषयों पर चर्चा का भी... गांधी जी किसी भी कार्य में स्पष्टवादिता के हिमायती थे। उनकी यही स्पष्टता उनके आंदोलनों की तैयारियों में भी झलकती थी। नमक आंदोलन या दांडी यात्रा आरम्भ करने से पूर्व भी उन्होंने 2 मार्च को वायसरॉय लॉर्ड इरविन को पत्र लिखा। पत्र के आरंभ में उन्होंने आंदोलन से पूर्व समझौते का रास्ता निकल आने के प्रयास का जिक्र किया। इसी पत्र में उन्होनें समस्त अंग्रेजों से नहीं बल्कि अंग्रेजी शासन की शोषण प्रणाली से आई दरिद्रता के प्रति अपनी नाराजगी का जिक्र किया।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वर्तमान सरकार दुनिया में सबसे ख़र्चीली है और इसे बनाये रखने की गरज से ही ये सारे अन्याय किये जा रहे हैं। जिस देश में हर एक आदमी की औसत रोजाना आमदनी दो आने से भी कम है उसमें आपको रोजाना 700 रु से भी अधिक मिलते हैं। उधर इंग्लैंड के बाशिंदों की औसत दैनिक आय लगभग दो रु है और वहां के प्रधानमंत्री को रोजाना सिर्फ 180 ही मिलते हैं। इस तरह आप अपनी तनख्वाह के रूप में 5000 से अधिक भारतीयों की औसत कमाई का हिस्सा ले लेते हैं, उधर इंग्लैंड के प्रधानमंत्री सिर्फ 90 अंग्रेजों की कमाई ही लेते हैं।... एक कठोर लेकिन सच्ची हकीकत को ठीक से समझाने के लिए मुझे आपका व्यक्तिगत उदाहरण पेश करना पड़ा है, नहीं तो निजी तौर पर मेरे दिल में आपके लिए इतनी इज्जत है कि मैं ऐसी कोई बात आपके बारे में नहीं कहना चाहूंगा जिससे आपके दिल को ठेस पहुंचे।..." और फिर प्रत्युत्तर में उन्हें वायसराय के निजी सचिव का पत्र मिला जिसमें उन्होंने लिखा कि उन्हें यह जानकर बहुत दुख हुआ कि आप एक ऐसा रास्ता अख्तियार करने जा रहे हैं जिससे स्पष्टतः कानून भंग होगा और सार्वजनिक शांति खतरे में पड़ जाएगी। प्रतिक्रिया में गांधीजी का विचार था कि- "...यदि वायसरॉय चाहते तो गरीबों को नमक पर जो कर चुकाना पड़ता है, उसे समाप्त करके मुझे निष्क्रिय बना दे सकते थे। इस कर को चुकाने में उन्हें प्रति वर्ष 5 आने अर्थात लगभग अपनी तीन दिन की कमाई देनी पड़ती है। मैं तो नहीं जानता कि भारत के अलावा किसी और देश में भी किसी को यदि उसकी सालाना आमदनी 360 रु हो तो 3 रुपये कर स्वरूप दे देने पड़ते हों।... वे उस राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आसानी से हार नहीं मानता, सहज ही अपने किए पर पश्चाताप नहीं करता। अनुनय- विनय से उसका हृदय नहीं पिघलता। शारीरिक शक्ति का दबदबा वह तुरंत स्वीकार करता है। वह मुक्केबाजी के किसी दंगल को घंटों तक सांस रोक कर बिना थके-ऊबे हुए देख सकता है।... हम चाहे जितनी जोरदार और कायल करने वाली दलील दें वह उससे प्रभावित होकर उन करोड़ों रुपयों की ओर से मुंह नहीं मोड़ सकता जो वह प्रतिवर्ष भारत से लूट कर ले जाता है। सो वायसरॉय महोदय के उत्तर से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।..." और फिर उस महान पदयात्रा के आह्वान का वक्त भी आ गया। साबरमती आश्रमवासियों और अपने सहयात्रियों को उन्होंने संबोधित करते हुए कहा- "...अपने सिर पर भारी जिम्मेवारी लेकर रवाना होने वाले हम आश्रमवासियों के पास एक ही पूंजी है। हम विद्वता की डींग तो हांक नहीं सकते। हमने जो व्रत लिए हैं और आश्रम जीवन की प्रतिज्ञा की है, हमें उन व्रतों का ही पालन करते रहना है। ये 72 लोग आश्रम-नियमावली को फिर से जांच लें और अपने जाने, न जाने की बात पर विचार कर लें। जिन आश्रमवासियों का कोई आश्रित है उसके लिए उन्हें आश्रम से पैसा नहीं मिल सकता। आश्रम के भरोसे किसी को इस लड़ाई में भाग नहीं लेना चाहिए। यह लड़ाई नाटक नहीं है; बल्कि यह आखिरी लड़ाई है। यदि उपद्रव हुआ तो हम अपने ही लोगों के हाथों मारे जा सकते हैं। उस हालत में भी हम तो सत्याग्रही के नाते अपना काम पूरा कर चुके होंगे... यदि हममें इतनी शक्ति न हो तो हमें इस लड़ाई में भाग नहीं लेना चाहिए। ... आप या तो मर कर या स्वराज्य लेकर ही लौटेंगे... यदि आश्रम में आग लग जाए तो भी हम वापस नहीं लौट सकते। केवल वही लोग इस कूच में भाग ले सकते हैं जिनका अपने सगे- संबंधियों के प्रति कोई विशेष कर्तव्य नहीं है।... हम जीवन-मरण का धर्मयुद्ध करने जा रहे हैं, एक व्यापक यज्ञ करने जा रहे हैं, जिसमें हम अपनी आहुति दे देना चाहते हैं। यदि आप लोग अक्षम सिद्ध होंगे तो लज्जा का भागी मैं होऊंगा, आप लोग नहीं। मुझे भगवान ने जो शक्ति दी है वह आप सब में भी है। आत्मा-मात्र एक है। मेरी आत्मा जागृत हो चुकी है, अन्य लोगों की आंशिक रूप से जागृत हुई है।"

Sunday, November 22, 2020

गांधी मार्ग की साधिका मीरा बेन

 


आज 'मीरा बेन' के नाम से प्रसिद्ध मेडेलीन स्लेड का जन्मदिन है। उन्हें यह नाम महात्मा गांधी ने ही दिया था। 

इंग्लैंड के अति संभ्रांत व संपन्न परिवार में 22 नवंबर 1892 को जिस मेडेलीन स्लेड का जन्म हुआ, उन्हें बापू ने 1925 में मीरा बहन बना दिया । पिता सर एडमंड स्लेड नौसेना के उच्चाधिकारी थे । बाद में वे कमांडर-इन-चीफ भी बनाए गए । जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, मेडेलीन उनसे विरक्त रहती थी। आडंबर उन्हें नहीं भाता था।



अपनी आत्मकथा The Spiritual Pilgrimage  में वे लिखती हैं: “पांच साल की उम्र से ही कभी किसी पंछी की आवाज या पेड़ों की सरसराहट मुझे कहीं दूर ले जाती थी । मैं किसी ‘अज्ञात प्रेरणा’ के वशीभूत उस छुपे सत्य को खोजने घोड़े की पीठ पर बैठ, अपने नाना के गांव वाले विशाल घर से खेतों, जंगलों, नदियों और सागर के आसपास जाकर प्रकृति से अपना नाता जोड़ा करती थी । मुझे उस ‘अज्ञात’ में भय के बजाय अपार आनंद का अनुभव होता !”

यही अज्ञात की तलाश उन्हें कई मोड़ों से होते भारत ले आई और महात्मा गांधी से जोड़ी; जो जुड़ाव जीवनपर्यंत बना रहा। 

मीरा का सारा जीवन बापूमय था और बापू के लोग ही उनके अपने संगी-साथी थे । डॉ. सुशीला नैयर उनके सबसे निकट थीं, जिनके साथ वे जेल में भी रही थीं । महादेव देसाई ने लिखा है : लंदन में राजसी ठाट में पली यह युवती गांधीजी के प्रति जिस निष्ठा और समर्पण से अपना जीवन बदलने में सफल रही, वैसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है। उन्होंने भारतीय गांवों में लंबे समय तक मानव मल की प्रत्यक्ष सफाई ही नहीं की बल्कि नया आदमी बनाने के काम मैं भी जुटी रहीं। वे बहुत ही सौम्य और शालीन थीं और बेहद निडर थीं। शराबबंदी के अभियान में शराबी जब उनके साथ बुरा बरताव करते थे तब उनकी शालीनता और दृढ़ता देखते बनती थीं। बारिश के दिनों में भी वे टूटी-फूटी झोंपड़ी में शांति से रहती थीं। वे अपना डेरा-डंडा संभाल कर सतत चलती रहने वाली किसी ध्यानमग्न साधिका-सी लगती थीं।”



1925 से 1944 तक, लगातार 20 साल वे बापू के साथ साबरमती और सेवाग्राम आश्रमों में रहीं । 1945 से 1958 तक 14 साल वे उत्तर भारत के हिमालय के इलाकों में रहीं। 1956 में कश्मीर से लौटकर वे फिर से टिहरी गढ़वाल आ गई। बदलती परिस्थितियों ने उनके कार्यों को प्रभावित किया और उन्होंने हमेशा-हमेशा के लिए भारत छोड़ने का मन बना लिया था। 1958 के अप्रैल में कृष्णमूर्ति गुप्ता को उन्होंने लिखा कि “मुझे एक ‘अनजानी ताकत’ फिर से बुला रही है । मैं इसकी अनसुनी नहीं कर सकती... शायद आज के भारत से ज्यादा बापू के विचारों की जरूरत पश्चिम में है।” 28 जनवरी 1959 को भारत छोड़ने से पहले वे कुछ दिन राष्ट्रपति भवन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ रहीं और फिर इंग्लैंड होती हुई वियना चली गईं। जंगलों के निकट, बिलकुल शांत-एकांत, प्राकृतिक सौंदर्य से भरी वह सुंदर सी जगह आखिरी दिनों तक उनका ठिकाना बनी रही।

गांधी जी ने उनसे जो कहा था, उनके बाद वही शब्द उनके साथ रहे- “मेरी चिंता न करना। ईश्वर पर भरोसा रखना। वही मुझे बनाएगा या बिगाड़ेगा। वही तो सब कुछ बनाता है!”

स्रोत: Gandhian Institutions - Bombay Sarvodaya Mandal & Gandhi Research Foundation


Wednesday, January 30, 2013

गाँधी Vs गोडसे : एक सकारात्मक चर्चा की जरुरत



गांधीजी के शहीद दिवस पर एक गंभीर चर्चा की आवश्यकता समझते हुए गांधीजी और गोडसे के उस वैचारिक मतभिन्नता को याद करना सामयिक होगा जो आज भी इस देश के अस्तित्व में है. इस क्रम में असगर वजाहत जी के नाटक 'गोडसे@गाँधी.कॉम' से साभार कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें इन दोनों के मध्य वार्तालाप का काल्पनिक वर्णन करते हुए एक वैचारिक विमर्श रचित किया गया है.
नाटक के शुरूआती अंश में अस्पताल से स्वस्थ हो गांधीजी गोडसे से मिलने जेल पहुँचते हैं-
गांधी : नाथूराम..परमात्‍मा ने तुम्‍हें साहस दिया.. और तुमने अपना अपराध कुबूल कर लिया.. सच्‍चाई और हिम्‍मत के लिए तुम्‍हें बधाई देता हूँ।
नाथूराम: मैंने तुम्‍हारी बधाई पाने के लिए कुछ न‍हीं किया था।
गांधी:  फिर तुमने अपना जुर्म कुबूल क्‍यों किया है?
नाथूराम : (उत्तेजित हो कर) जुर्म.. मैंने कोई अपराध नहीं किया है। मैंने यही बयान दिया है कि मैंने तुम पर गोली चलाई थी। मेरा उद्देश्‍य तुम्‍हारा बध करना था...
गांधी : तो तुम मेरी हत्‍या को अपराध नहीं मानोगे?
नाथूराम : नहीं...
गांधी : क्‍यों?
नाथूराम : क्‍योंकि मेरा उद्देश्‍य महान था..
गांधी : क्‍या?
नाथूराम : तुम हिंदुओं के शत्रु हो..सबसे बड़े शत्रु..इस देश को और हिंदुओं को तुमसे बड़ी हानि हुई है...हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान अर्थात हिंदुत्व को बचाने के लिए एक क्‍या मैं सैकड़ों की हत्‍या कर सकता हूँ।
गांधी : ये तुम्‍हारे विचार हैं.. मैं विचारों को गोली से नहीं, विचारों से समाप्‍त करने पर विश्‍वास करता हूँ...
नाथूराम : मैं अहिंसा को अस्‍वीकार करता हूँ।
गांधी : तुम्‍हारी मर्जी... मैं तो यहाँ केवल यह कहने आया हूँ कि मैंने तुम्‍हें माफ कर दिया।
नाथूराम : (घबरा कर) ... नहीं-नहीं.. ये कैसे हो सकता है?
गांधी : मैं अदालत में बयान देने भी नहीं जाऊँगा।
नाथूराम: (अधिक घबरा कर) नहीं.. नहीं.. तुम ये नहीं कर सकते।
गांधी : (शांत स्‍वर में) गोडसे..तुमने अपनी अंतरात्‍मा की आवाज सुनी.. मुझे मेरी अंतरात्‍मा की आवाज सुनने दो..।
नाथूराम : तुम्‍हारी हत्‍या के आरोप में मैं फाँसी पाना चाहता था।
गांधी : परमात्‍मा से माँगो, तुम्‍हारे मन को शांत रखे... दूसरे के लिए हिंसा अपने लिए भी हिंसा..ये क्‍या है नाथूराम...तुम ब्राह्मण हो, ब्राह्मण के कर्म में ज्ञान, दया, क्षमा और आस्तिकता होनी चाहिए।
नाथूराम : मुझे मेरा कर्म मत समझाओं गांधी... मैं जानता हूँ।
गांधी : ईश्‍वर तुम्‍हें शांति दे...।
 गांधीजी के प्रति अपनी घृणा जो गोडसे में कम नहीं होती, इसकी झलक इस प्रसंग से मिलती है जहाँ गांघीजी द्वारा कॉन्ग्रेस का त्याग करने पर वो अपने विचार व्यक्त करता है –
करकरे : नाथूराम...देखा तुमने
नाथूराम : क्‍या करकरे...।
करकरे : ये देखा... गांधी ने कांग्रेस छोड़ दी है।
(नाथूराम और नाना अखबार देखते है।)
नाथूराम : सब पाखंड है... गांधी तो सदा झूठ बोलता ही रहा है। उसकी किसी बात पर विश्‍वास नहीं किया जा सकता।
नाना : क्‍या छापा है... दिखाओ।
(तीनों अखबार पढ़ते हैं।)
नाथूराम : गांधी तो पूरा पाखंडी है। कांग्रेस छोड़ दी... अरे वह तो कांग्रेस का मेंबर तक नहीं था।
करकरे : पर अखबार में झूठ कैसे छप सकता है।
नाथूराम : गांधी ने कभी सच बोला है? कहा करता था पाकिस्‍तान मेरी लाश पर बनेगा। लेकिन देखा क्‍या हुआ। पाकिस्‍तान का पिता जिन्‍ना नहीं, गांधी है। हिंदुओं का जितना अहित औरंगजेब ने न किया होगा, उससे ज्‍यादा गांधी ने किया है... पवित्र भूमि पर इस्‍लामी राष्‍ट्र का निर्माण उसकी ही नीतियों के कारण हुआ है।
(नाथूराम उठ कर बेचैनी से टहलने लगता है। उसके चेहरे पर पीड़ा और क्रोध दिखाई पड़ता है। लगता है वह बहुत भावुक हो गया है। वह धीरे-धीरे पर बड़े ठहरे हुए ढंग से बोलता है।)
नाथूराम : नाना, अपने को असहाय समझने, अपमानित होने और निष्क्रिय बौद्धिकता की एक सीमा है... जब मुझे लगा था कि एक आदमी है... हमारे-तुम्‍हारे जैसा आदमी... वह इतना शक्तिशाली है कि जूरी भी वही है, जज भी वही है। मुकद्दमा दायर वही करता है, सुनता भी वही है और फैसला भी वही सुनाता है...और सारा देश उसका फैसला मान लेता है... और यह सब होता है हमारी कीमत पर... मतलब हिंदुओं की कीमत पर नाना, यह देश हमारा है... पवित्र मातृभूमि है... हमारी कीमत पर मुसलमानों को सिर पर चढ़ाना इतना अपराध है जिसकी कल्‍पना नहीं की जा सकती। गांधी यही करता रहा है... शुरू से, खि‍लाफत आंदोलन से ले कर पाकिस्‍तान बनने तक... यही वजह थी कि मुझे अपना जीवित रहना अर्थहीन लगने लगा था... हिंदुत्व के लिए, मातृभूमि के लिए, हजारों साल की संस्‍कृ‍ति के लिए क्‍या एक आदमी, मेरे जैसे तुच्‍छ आदमी, अपना बलिदान नहीं दे सकता? क्‍या पूरी हिंदू जाति नपुंसक हो गई है। गुरू जी ने कहा था कि गांधी ने अपनी उम्र जी ली है तब मुझे लगा था कि यही समय है, यह निकल गया तो हमेशा हाथ मलते रह जाएँगे। यह मातृभूमि और हिंदू जाति के लिए मेरी तुच्‍छ सेवा होगी जिसे कानूनी तौर पर चाहे अपराध माना जाए लेकिन ईमानदारी से इतिहास लिखनेवालों के लिए यह एक स्‍वर्णिम अध्‍याय होगा... समझे तुम।
नाना : तुम महान हो... गोडसे।
गोडसे : ये बकवास है नाना... कोरी बकवास... मैं अपने उद्देश्‍य को पूरा न कर सका... तुम अनुमान लगा सकते हो कि मेरे मन में कैसी ज्‍वाला धधक रही है?
गाँधीजी के ग्राम स्वराज के प्रयासों की सूचना गोडसे तक अख़बारों के माध्यम से पहुँचती है तो वह अपने विचार व्यक्त करता है –
करकेर : ये गांधी क्‍या कर रहा है, समझ में नहीं आता।
गोडसे : (लापरवाही से) यह सब मजाक है करकरे... गांधी ने हर काम इसी तरह किया है।
करकरे : लेकिन सरकार से इस तरह का व्‍यवहार करना तो कठिन है।
गोडसे : सरकार किसकी है? उसी की सरकार है, वही सबसे बड़ा मुखिया है...
करकरे : गांधी की लोक‍प्रियता... भी बढ़ रही है... आदिवासी क्षेत्र में स्‍वराज का काम फैल रहा है...
गोडसे : तुम भ्रम में हो करकरे... सच्‍चाई कुछ और है...
(नाना आप्‍टे कुछ चिट्ठि‍याँ और एक पैकेट लिए मंच पर आते हैं। )
नाना : (गोडसे को चिट्ठि‍याँ देते हुए) ... तुम्‍हारी डाक दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है...
करकरे : इस पैकेट में क्‍या है?
गोडसे : लो खोल कर देख लो।
(करकरे पैकेट खोल कर देखता है। )
नाना : अरे ये तो स्‍वेटर है...
करकरे : ये पत्र भी है... देखो
(करकरे पत्र गोडसे को दे देता है। )
गोडसे : (पढ़ता है) परम पूजनीय हिंदू हृदय सम्राट महामना श्री नाथूराम गोडसे जी...।
(रूक जाता है।)
नाना : पढ़ो-पढ़ो, क्‍या लिखा है?
गोडसे : लो, तुम ही पढ़ो।
नाना : शहर की समस्‍त हिंदू स्त्रियों की ओर से चरण स्‍पर्श... करने के बाद निवेदन है कि जाड़ा आ रहा है और सर्दी से बचने के लिए हमारी छोटी-सी भेंट स्‍वीकार...
करकरे : (बात काट कर) कमाल है गोडसे तुम्‍हारी लोकप्रियता आकाश छू रही है।
नाना : गोडसे जब तुम अदालत में बयान दिया करते थे तो मैंने लोगों की आँखों से टप-टप आँसू बहते देखा हैं। लोग इतना प्रभावित और द्रवित हो जाते थे कि रोते थे...
गोडसे : इसमें आश्‍चर्य की कोई बात नहीं नाना... मैं अपने को सौभाग्‍यशाली समझता हूँ... मेरे पास कॉलिज क्‍या, स्‍कूल तक का कोई प्रमाण-पत्र नहीं है... लेकिन मुझे श्रद्धा करनेवाले हजारों-लाखों हैं। क्‍योंकि हिंदुत्व की रक्षा ही मेरा जीवन है।
करकरे : वार्डर बता रहा था कि नौजवान तुम्‍हारी एक झलक पाने के लिए जेल के चक्‍कर लगाया करते हैं।
गोडसे : गुरूजी का आशीर्वाद है... यह उनका ही दिखाया हुआ रास्‍ता है। उन्‍होंने साफ शब्‍दों में मुझसे कहा था कि हिंदू हितों की उपेक्षा करनेवाले देश शत्रु है और शत्रु को मित्र नहीं समझना चाहिए... पर दुख की बात है कि मैं अपना काम पूरा नहीं कर सका।
नाना : नाथूराम, दुख मत करो... भगवान तुम्‍‍हें अवसर देगा। न्‍याय होकर रहेगा। और यह अच्‍छा है कि गांधी सत्ता से दूर चला गया है। लगता है अब कांग्रेस में उसका वह स्‍थान भी नहीं है जो पहले हुआ करता था।
गोडसे : कुछ हो या न हो... गांधी भारत विभाजन का अपरा‍धी है और भारत विभाजन को तुम क्‍या समझते हो नाना... यह हमारे धर्म, इतिहास और आस्‍था का विभाजन है।... और सुनो विभाजन के बाद असंख्य हिंदुओं की हत्‍या करने और बाकी हिंदुओं को पाकिस्तान से भगानेवाले मुसलमानों से गांधी की सरकार ने कहा - आप लौट आइए... हमारा देश धर्म निरपेक्ष है, आप कैसा भी व्‍यवहार क्‍यों न करें हम तो आप से भला ही व्‍यवहार करेंगे... आपको मारने के लिए कोई हाथ उठाएगा तो उसका पूरा नाश करने के लिए हमने सेना को तैयार कर लिया है। हमारी बंदूक आपके ऊपर कभी नहीं तनेगी क्‍योंकि उसमें हिंसा होने का भय है...
नाना : इसी को गुरुजी मुस्लिम तुष्टिकरण कहते हैं...
गोडसे : हाँ... बिलकुल ठीक कहते हो, लेकिन इतिहास का चक्र घूम चुका है।
ग्राम स्वराज और स्वशासन के गांधीजी के प्रयासों को देशहीत में न मानते हुए उन्हें जेल की सजा दी जाती है, जहाँ वो गोडसे के ही कक्ष में रखे जाने की जिद करते हैं; जो अंततः माँ ली जाती है. इस कक्ष में इनके बीच लगातार ‘डायलोग’ चलते हैं –
गोडसे : तुम इस वार्ड में मेरे पास क्‍यों आना चाहते थे।
गांधी : वैसे तो लंबी बात है, कम में कहा जाए तो ये समझ लो, मेरे ऊपर गोली चलाने के बाद तुमसे लोग घृणा करने लगे या प्रेम करने लगे। कह सकते हो, घृणा करनेवालों की तादाद प्रेम करनेवालों की तादाद से ज्यादा थी। लेकिन संख्या से क्‍या होता है। मैं घृणा और प्रेम के बीच से नया रास्‍ता, संवाद का रास्‍ता 'डॉयलॉग' का रास्‍ता निकालना चाहता हूँ... तुमसे बात करना चाहता हूँ।
गोडसे : जरूर करो... लेकिन यह समझ कर न करना कि मेरे विचार कच्‍ची मिट्टी के घड़े हैं।
गांधी : नहीं गोडसे... मैं मानता हूँ, तुम्‍हारे विचार बहुत पक्‍के हैं, तुम्‍हारा विश्‍वास बहुत अडिग है, तुम साहसी हो क, ऐसा न होता तुम भरी प्रार्थना सभा में मेरे ऊपर गोली न चलाते... उसके बाद आत्‍मसमर्पण न करते।
गोडसे : हाँ, ये ठीक है मैंने जो कुछ किया था... अपने लिए नहीं किया था... मेरी तुमसे कोई निजी दुश्‍मनी न थी और न है। मैं हिंदुत्व की रक्षा अर्थात हिंदू जाति, हिंदू धर्म और हिंदुस्तान को बचाने के लिए तुम्‍हारी हत्‍या करना चाहता था।
गांधी : मैं खुश हूँ गोडसे... तुम सच बोल रहे हो...
गोडसे : मैंने यही बात अदालत में कही थी...
गांधी : अफसोस की बात यह है कि अदालत में संवाद नहीं होता... सिर्फ बयान और जिरह होती है...
गोडसे : संवाद होता तो क्‍या पूछते?
गांधी : सवाल तो यही पूछता कि हिंदू से तुम्‍हारा मतलब क्‍या है? पहली बात यह कि यह शब्‍द कहाँ से आया? वेद पुराण और उपनिषदों में यह शब्‍द नहीं मिलता... पुराणों में लिखा है, समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में जो देश है उसका नाम भारत है, यहाँ भरत की संतानें रहती हैं। (गोडसे उठ कर खड़ा हो जाता है। इधर-उधर टहलने लगता है। गांधी उसे ध्‍यान से देखते हैं।)
गोडसे : गांधी, हिंदू शब्‍द बहुत प्राचीन है... यह भ्रम फैलाया गया है कि हिंदू शब्‍द विदेशियों ने दिया था... तुमने प्रश्‍न किया था कि हिंदू से मैं क्‍या अर्थ लेता हूँ, वैदिक धर्म और उनकी शाखाओं पर विश्‍वास करने वालों को मैं हिंदू मानता हूँ और सिंधु नदी के पूर्व में जिस धरती पर हिंदू बसते हैं वह हिंदुस्‍थान है।
(बावनदास और प्‍यारेलाल भी बैठ कर बातचीत सुनने लगते हैं। )
गांधी : गोडसे तुम 'हिंदूस्थान' से प्रेम करते हो।
गोडसे : प्राणों से अधिक।
गांधी : क्‍या मतलब?
गांधी : तुमने सिंधु से लेकर असम और कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक का इलाका देखा है?
गोडसे : तुम कहना क्‍या चाहते हो गांधी...।
गांधी : (प्‍यारेलाल से) ... चर्खा इधर उठा दो... मेरे हाथ काम माँग रहे हैं।
(प्‍यारेलाल और बावनदास चर्खा उठा कर गांधी के सामने रख देते हैं। वे चर्खा चलाने लगते हैं।)
गांधी : (गोडसे से) मैं 1915 में जब भारत आया था और यहाँ सेवाभाव से काम करना चाहता था तो मेरे गुरु महामना गोखले ने मुझसे कहा था कि गांधी हिंदुस्तान में कुछ करने से पहले इस देश को देख लो। और मैंने एक साल तक देश को देखा था। और उसका इतना प्रभाव पड़ा कि मैं चकित रह गया।
गोडसे : कैसे?
गांधी : जिसे हम 'हिंदुस्‍थान' या 'हिंदुस्तान' कहते हैं वह एक पूरा संसार है गोडसे... और उस संसार में जो कुछ है... जो रहता है... जो काम करता है... उससे हिंदुस्तान बनता है...
गोडसे : ये गलत है 'हिंदुस्थान' केवल हिंदुओं का देश है...
गांधी : तुम हिंदुस्तान को छोटा कर रहे हो गोडसे... हिंदुस्तान तुम्‍हारी कल्‍पना से कहीं अधिक बड़ा है... परमेश्‍वर की विशेष कृपा रही है इस देश पर...
गोडसे : सैकड़ों साल की गुलामी को तुम कृपा मान रहे हो?
गांधी : गोडसे, असली आजादी मन और विचार की आजादी होती है... हिंदूमत कभी पराजित नहीं हुआ, राम ने अपना विस्‍तार ही किया है...
गांडसे : तुम्‍हें राम से क्‍या लेना-देना... गांधी... तुमने तो राम और रहीम को मिला दिया। ईश्‍वर अल्‍लाह को तुम एक मानते हो...
गांधी : हाँ, गोडसे मैं वही कर रहा हूँ जो यह देश हजारों साल से करता आया है... समझे? समन्‍वय और एकता।
गोडसे : समन्‍वय... यह शब्‍द... मैं इससे घृणा करता हूँ... हम विशुद्ध हैं... हमें हिंदू होने पर गर्व है... हम सर्वश्रेष्‍ठ हैं... सर्वोत्तम हैं...
डायलौग के अगले चरण में पुनः –
गोडसे : नहीं... उसने जो कहा वह सत्‍य ही कहा है। देश के बहुत से भोलेभाले लोगों को यह नहीं मालूम कि तुम हिंदू विरोधी हो।
गांधी : कैसे गोडसे?
गोडसे : एक-दो नहीं सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं... सबसे बड़ा तो यह है कि तुमने कहा था न कि पाकिस्‍तान तुम्‍हारी लाश पर बनेगा... उसके बाद तुमने पाकिस्‍तान बनाने के लिए अपनी सहमति दे दी।
गांधी : गोडसे... मैंने जो कहा था... वह सत्‍य है... सावरकर ने कहा था कि वे खून की अंतिम बूँद तक पाकिस्तान के विचार का विरोध करेंगे... लेकिन देखो आज मैं जीवित हूँ... सावरकर के शरीर में पर्याप्त खून है... पर एक बात है गोडसे...।
गोडसे : क्‍या?
गांधी : मैं पाकिस्‍तान बनाने का विरोध कर रहा था और करता हूँ... तो ये बात समझ में आती है... पर मुझे समझा दो कि सावरकर पाकिस्‍तान का विरोध क्‍यों करते है?
गोडसे : क्‍या मतलब... मातृभूति के टुकड़े...।
गांधी : (बात काट कर) ... सावरकर तो यह मानते हैं... लिखा है उन्‍होंने कि मुसलमान और हिंदू दो अलग-अलग राष्‍ट्रीयताएँ हैं... इस विचार के अंतर्गत तो उन्‍हें पाकिस्तान का स्‍वागत करना चाहिए...
गोडसे : यह असंभव है... गुरुजी... पर आरोप है...
गांधी : सावरकर की पुस्‍तक 'हिंदू राष्‍ट्र दर्शन'... मैंने पुणे जेल में सुनी थी... कृपलानी ने सुनाई थी देखो... अगर तुम किसी को अपने से बाहर का मानोगे और वो बाहर चला जाता है तो इसमें एतराज कैसा? हाँ, भारत विभाजन का पूरा दुख तो मुझे है क्‍योंकि मैं इस सिद्धांत को मानता ही न‍हीं कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्‍ट्र हैं।
गोडसे : अगर तुम पाकिस्‍तान के इतने ही विरोधी हो तो तुमने 55 करोड़ रुपए दिए जाने के लिए आमरण अनशन क्‍यों किया था?
गांधी : रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाय पर वचन न जाई। पाकिस्‍तान-हिंदुस्तान का कोई सवाल ही न था... सवाल था अपने वचन से मुकर जाने का... समझे...
गोडसे : तुमने अपने सिद्धांतों की आड़ में सदा मुसलमानों का तुष्‍टीकरण किया है।
गांधी : दक्षिण अफ्रीका में मैंने जो किया, क्‍या वह केवल मुसलमानों के लिए था? चंपारण, अहमदाबाद के आंदोलन क्‍या केवल मुसलमानों के लिए थे? असहयोग आंदोलन में क्‍या केवल मुसलमान थे? हरिजन उद्धार और स्‍वराज का केंद्र क्‍या मुसलमान थे? हाँ, जब मुसलमान ब्रिटिश साम्रज्‍यवाद के विरूद्ध खि‍लाफत आंदोलन में उठ खड़े हुए तो मैंने उनका साथ दिया था... और इस पर मुझे गर्व है।
गोडसे : खि‍लाफत आंदोलन से प्रेम और अखंड भारत से घृणा यही तुम्‍हारा जीवन दर्शन रहा है... हिंदू राष्‍ट्र के प्रति तुम्‍हारे मन में कोई सहानुभूति नहीं है।
गांधी : हिंदू राष्‍ट्र क्‍या है गोडसे?
गोडसे : वो देखो सामने मानचित्र लगा है... अखंड भारत...
(गांधी उठ कर नक्‍शा देखते हैं।)
गांधी : गोडसे... यही अखंड भारत का नक्‍शा है?
गोडसे : हाँ... यह हमारा है... भगवा लहराएगा...इस क्षेत्र में...
गांधी : गोडसे... तुम्‍हारा अखंड भारत तो सम्राट अशोक के साम्राज्‍य के बराबर भी नहीं है... तुमने अफगानिस्‍तान को छोड़ दिया है... वे क्षेत्र छोड़ दिए हैं जो आर्यो के मूल स्‍थान थे... तुमने तो ब्रिटिश इंडिया का नक्‍शा टाँग रखा है... इसमें न तो कैलाश पर्वत है और न मान सरोवर है...
गोडसे : ठीक कहते हो गांधी... वह सब हमारा है...
गांधी : गोडसे... तुमसे बहुत पहले हमारे पूर्वजों ने कहा था, वसुधैव कुटुंबकम... मतलब सारा संसार एक परिवार है... परिवार... परिवार की मर्यादाओं का ध्‍यान रखना पड़ता है।
इस बीच जेल में गांधीजी अपना सफाई अभियान भी आरंभ करदेते हैं जिसमें शुद्धाताप्रिय गोडसे भाग नहीं लेता.
इस बीच एक विवाह अवसर पर गांधीजी नवदंपत्ति को गीता की प्रति भेंट करते हैं. गोडसे यह देख उनसे प्रश्न करता है –
गोडसे : तुमने गीता भेंट की है?
गांधी : हमेशा... हर जोड़े को गीता भेंट करता हूँ। और ये भी जानता हूँ कि तुम भी...
गोडसे : गीता मेरा जीवन दर्शन है।
गांधी : गीता मेरा भी दर्शन है।... कितनी अजीब बात है गोडसे।... गीता ने तुम्‍हें मेरी हत्‍या करने की प्रेरणा दी और मुझे तुम्‍हें क्षमा कर देने की प्रेरणा दी... ये कैसा रहस्‍य है?
गोडसे : तुमने गीता को तोड़-मरोड़ कर अहिंसा से जोड़ दिया है, जबकि गीता निष्‍फल कर्म का दर्शन है। युद्ध के क्षेत्र में निष्‍फल कर्म से प्रेरित अर्जुन अपने प्रियजनों तक की हत्‍या कर देते हैं।
गांधी : लड़ाई के मैदान में हत्‍या करने और प्रार्थना सभा में फर्क है गोडसे।
गोडसे : कर्म के प्रति सच्‍ची निष्‍ठा ही काफी है। स्‍थान का कोई महत्‍व नहीं है। महाभारत तो जीवन के हर क्षेत्र में हो रहा है।
गांधी : गोडसे... मैंने पूरे जीवन जितनी मेहनत गीता को समझने में की है... उतनी कहीं और नहीं की है... गीता कर्म की व्‍याख्या भी करती है... गीता के अनुसार यज्ञ कर्म मतलब, दूसरों की भलाई के लिए किया जाने वाला काम ही है। हत्या किसी की भलाई में किया जाने वाला काम नहीं हो सकती।
गोडसे : मुद्दा यह है कि हत्‍या क्‍यों की जा रही है? उद्देश्‍य क्‍या है? कितना महान है, कितना पवित्र है?
गांधी : गोडसे... तुमसे शिकायत है... तुमने मेरी आत्‍मा को मारने का प्रयास क्‍यों नहीं किया?
गोडसे : आत्‍मा? वो तो अजर और अमर है...
गांधी : और शरीर का कोई महत्‍व नहीं है। तुमने कम महत्‍व के शरीर पर हमला किया... और आत्‍मा को भूल गए।
गोडसे : तुम्‍हारा वध हिंदुत्व की रक्षा के लिए जरूरी था।
गांधी : इसका निर्णय किसने किया था?
गोडसे : देश की हिंदू जनता ने...
गांधी : कौन सी हिंदू जनता?... जिसमें मेरे अलावा सभी हिंदू शामिल थे...
गोडसे : वे सब जो सच्‍चे हिंदू हैं... तुम तो हिंदुओं के शत्रु हो...
गांधी : तुम मुझे शत्रु मानते हो?
गोडसे : बहुत बड़ा, सबसे बड़ा शत्रु...
गांधी : गीता शत्रु और मित्र के लिए एक ही भाव रखने की बात करती है... यदि मैं तुम्‍हारा शत्रु था भी तो तुमने शत्रु भाव क्‍यों रखा?...गोडसे, गीता सुख-दुख, सफलता-असफलता, सोने और मिट्टी, मित्र और शत्रु में भेद नहीं करती... समानता, बराबरी का भाव है गीता में...
गोडसे : मैं महात्‍मा नहीं हूँ... उद्देश्‍य की पूर्ति...
गांधी : अच्‍छे काम भी गलत तरीके और भावना से करोगे तो नतीजा अच्‍छा न‍हीं निकलेगा... सब खराब हो जाएगा।
गोडसे : मैं नहीं मानता।
गांधी : हम सब अपने विचारों के लिए आजाद हैं... लेकिन हत्‍या करने की आजादी नहीं है।
दोनों के बीच चर्चाओं के दौर चलते रहते हैं और वह दिन आता है जब दोनों एक ही दिन रिहा होते हैं. नाटक के अंतिम दृश्य का वर्णन लेखक के इन शब्दों में –
जेल का फाटक खुलता है। गांधी और गोडसे बाहर आते हैं। दोनों रुक जाते हैं।
गांधी : नाथूराम... मैं जा रहा हूँ। वही करता रहूँगा जो कर रहा था। तुम भी। शायद वही करते रहोगे, जो कर रहे थे।
(गोडसे गोधी की तरफ अर्थपूर्ण ढंग से देखता है। दोनों एक-दूसरे की आँखों में नजरें गड़ा देते हैं। गांधी, गोडसे को हाथ जोड़ कर नमस्‍कार करते हैं। गोडसे भी हाथ जोड़ देता है। गांधी मंच पर बाईं तरफ आगे बढ़ते हैं। गोडसे दाहिनी तरफ जाता है। दोनों की पीठ दर्शकों की तरफ है। अचानक गांधी रुक जाते हैं, पर पीछे मुड़ कर नहीं देखते। गोडसे भी रुक जाता है और घूम कर गांधी के पीछे आता है। जब वह गांधी के बराबर पहुँचता है। गांधी बिना उसकी तरफ देखे अपना बायाँ हाथ बढ़ा कर उसके कंधे पर रख देते हैं और दोनों आगे बढ़ते हैं...)
यूँ तो यह मात्र एक नाटक है, मगर इसमें व्यक्त विचारों की प्रासंगिकता आने वाले समय में भी बनी रहेगी. अपने कथ्य की दृष्टि से इस नाटक की प्रासंगिकता सदा बनी रहेगी, जिसके लिए लेखक हार्दिक बधाई के पात्र हैं. आवश्यकता है कि आज भी जारी इस वैचारिक संघर्ष का एक तार्किक निष्कर्ष निकले और देश की समस्त विचारधाराएं एकसूत्र में पिरोई जाकर देश की क्षवि और भी उज्जवल करे उसे सशक्त करे. गांधीजी के बलिदान को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी. 
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