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Thursday, July 29, 2021

गांधी जी की विद्रोहिणी पुत्री: अरुणा आसफ़ अली

 





आज प्रसिद्ध क्रांतिकारी अरुणा आसफ़ अली जी की पुण्यतिथि है। स्वभाव से विद्रोहिणी अरुणा जी के व्यक्तित्व की झलक उनकी राजनीतिक यात्रा से भी मिलती है। 1948 में अरुणा जी कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं। दो साल बाद 1950 में वो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बनीं। कम्युनिस्ट पार्टी से मोह भंग होने के बाद 1958 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी। 1958 में वो दिल्ली की पहली महिला मेयर बनीं। सन् 1964 ई. में पं. जवाहरलाल नेहरू जी के निधन के पश्चात वे पुनः कांग्रेस से जुड़ीं, किंतु अधिक सक्रिय नहीं रहीं।


उनके लिए गांधी जी ने कहा था- "अरुणा मेरी पुत्री है; भले ही यह विद्रोहिणी हो, या मेरे घर में पैदा न हुई हो, पर मेरे लिए तो वह हर हालत में पुत्री ही रहेगी।"


एक भाषण में उन्होंने कहा था- 


"मुझसे कई बार पूछा जाता है कि तुम 1942 के पहले तो समाजवादी न थीं, अब कैसे बन गई? तुम पूंजीपतियों की निंदा क्यों करती हो?... इन सब बातों के कारण भी उपर्युक्त हैं। बापू जी के उपवास के वक्त मैंने कई धनवानों को अपने हाथों से पत्र लिखे थे कि 'कृपया लिनलिथगो से मिलिए', 'बापू जी की जिंदगी बचाईये'। उन लोगों का जवाब मिला 'हमारे हाथ बंधे हैं', 'हम लाचार हैं', 'आपकी मदद नहीं कर सकते'- आज वे ही पूंजीपति ब्रिटेन के उद्योगपतियों के साथ मिलकर और करारनामा करके भारत में ब्रिटिश माल मंगाने की व्यवस्था कर रहे हैं, ब्रिटिश माल पर भारत की छाप लगा कर बेच रहे हैं। उनके प्रति मेरी घृणा का यही कारण है।


आज हमें सिर्फ संघर्ष के बाद करना है, हम समझौतों को नहीं मानते न एटली या उनकी मजदूर सरकार को पहचानते हैं। हमारी सबसे ज्यादा पहचान तो बंबई की पुलिस है। आज भाषण या ठहराव करने का जमाना नहीं, जरूरत है काम करने की, लड़ाई के लिए तैयारी करने की।... आज मैं आपके सामने भाषण कर रही हूँ, कौन जानता है कल या उसके बाद वर्षों तक मैं आपके सामने आ भी न सकूं। गांधी जी ने ही हम लोगों को असहयोग का मंत्र दिया है, और आजादी का मार्ग भी यही है, हिंसा या अहिंसा उसके के साधन मात्र हैं। असहयोग स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण उपाय है। गांधीजी के असहयोग मंत्र देने के बाद आज 40 करोड़ की आंखों में एक नई ज्योति दिखाई देती है। आज हमारे सम्मुख गांधीजी के उस असहयोग को अपने-आप में समा लेने का प्रश्न है।"

Thursday, July 15, 2021

दुर्गाबाई देशमुख: छोटी सी गुड़िया की लंबी कहानी...



असहयोग आंदोलन पूरे देश में जोर-शोर से चल रहा था। महात्मा गांधी पूरे भारत में घूम-घूमकर लोगों को संबोधित कर रहे थे। 2 अप्रैल, 1921 को महात्मा गांधी आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा में एक सभा करनेवाले थे। मुख्य कार्यक्रम वहां के टाउन हॉल में आयोजित होने वाला था। जब इस बारे में वहां के एक बालिका विद्यालय की 12 साल की छात्रा को पता चला, तो उसने तय किया कि वह वहां की प्रचलित देवदासी प्रथा की शिकार महिलाओं को तथा बुर्का कुप्रथा की शिकार मुस्लिम महिलाओं को भी गांधीजी से मिलवाएंगी। वह चाहती थी गांधीजी इन महिलाओं को कुछ ऐसा संदेश दें जिससे ये इन कुप्रथाओं से उबर सकें।

किन्तु गाँधी जी से मिलना आसान नहीं था। उनके पास बहुत कम समय होता था और स्थानीय आयोजक अपने कार्यक्रम को लेकर बहुत व्यस्त थे, इसलिए आयोजकों ने टालने के लिए उस छोटी सी लड़की से कह दिया कि यदि उसने गांधीजी को देने के लिए पांच हजार रुपये का चंदा इकट्ठा कर लिया तो गांधीजी का दस मिनट का समय उन महिलाओं के लिए मिल जाएगा। आयोजकों ने हंसी-हंसी में सोचा होगा कि यह बच्ची भला पांच हजार रुपये कैसे इकट्ठा कर पाएगी। इसके बाद दुर्गाबाई अपनी देवदासी सहेलियों से जाकर मिली और इस शर्त के बारे में बताया। देवदासियों ने कहा कि रुपयों का इंतजाम तो हो जाएगा लेकिन वह रोज आकर उनसे मिले और उन्हें गांधीजी के देश के प्रति योगदान के बारे में बताए। कहा जाता है कि एक सप्ताह के भीतर ही रुपयों का इंतजाम हो गया।

अब समस्या थी कि गांधीजी से मिलने का यह कार्यक्रम किस जगह पर रखा जाए। देवदासियां और बुर्कानशीं महिलाएं आम सभा में जाने से हिचक रही थीं। स्थानीय आयोजकों ने कोई मदद नहीं की। इसलिए दुर्गाबाई ने उन्हें रुपये देने से इनकार कर दिया और खुद ही कार्यक्रम के लिए उपयुक्त जगह की तलाश में जुट गई। वह अपने स्कूल के हेडमास्टर शिवैया शास्त्री के पास गई और अनुरोध किया कि स्कूल के ही विशाल मैदान में कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी जाए। उन्होंने अनुमति दे दी। स्थानीय आयोजकों ने कहा कि गांधीजी का केवल पांच मिनट ही इस कार्यक्रम के लिए मिल पाएगा। दुर्गाबाई उतने से ही संतुष्ट थीं।

स्कूल का मैदान रेलवे स्टेशन और टाउन हॉल के बीच में ही पड़ता था इसलिए गांधीजी पहले महिलाओं की इस विशेष सभा में ही पहुंचे। वहाँ एक हजार से अधिक महिलाएं जुटी थीं। जैसे ही गांधीजी ने बोलना शुरू किया, वे बोलते चले गए। आधा घंटा बीत गया लेकिन गांधी लगातार बोलते जा रहे थे और महिलाएं अपने आभूषण, कंगन, गले के कीमती हार आदि उनके कदमों में रखती जा रही थीं। इस तरह लगभग पच्चीस हजार रुपयों की थैली इकट्ठा हो चुकी थी। गांधीजी ने महिलाओं की मुक्ति पर जोर देते हुए कहा कि देवदासी और बुर्का जैसी कुप्रथाओं को जाना ही होगा। गांधीजी का यह पूरा भाषण हिंदुस्तानी में था और इसका तेलुगु में अनुवाद वह 12 वर्षीया लड़की ही कर रही थी ।

इसके बाद जब वो सबके साथ गांधीजी को स्कूल के दरवाजे तक छोड़ने गईं, तो गांधीजी ने उनसे कहा- ‘दुर्गा, आओ मेरे साथ मेरी कार में बैठो।’ वह छोटी बच्ची दुर्गाबाई कार की पिछली सीट पर कस्तूरबा के साथ जा बैठी। बगल में प्रभावती (जयप्रकाश नारायण की पत्नी) भी बैठी थीं। जब गांधी जी टाउन हॉल में पहुंचे और वहां सभा को संबोधित करना शुरू किया तो वहां के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी कोंडा वेंकटाप्पैय्या ने गांधीजी के हिंदुस्तानी में दिए जा रहे भाषण को तेलुगु में अनुवाद करना शुरू किया। गांधीजी ने बीच में ही उन्हें रोककर कहा- ‘वेंकटाप्पैय्या, अनुवाद दुर्गा को करने दो। आज सुबह उसने मेरे भाषण का क्या खूब अनुवाद किया है।’ इसके बाद से गांधीजी ने जब भी आंध्र का दौरा किया तो दुर्गाबाई ने ही उनके अनुवादक का काम किया।

दुर्गाबाई ने गांधीजी के सामने ही विदेशी कपड़ों की होली जलाई। अपने कीमती आभूषण उन्होंने आजादी के आन्दोलन के लिए गाँधी जी को दान में दे दिए तथा स्वयं को एक स्वयं सेविका के रूप में समर्पित कर दिया। महात्मा गांधी भी इस छोटी सी लडकी के साहस को देखकर दंग रह गये थे।

यही वो बच्ची थी जिसने बाद में जब काकीनाड़ा में  कांग्रेस का अधिवेशन था तब जवाहरलाल नेहरु को बिना टिकट प्रदर्शनी में जाने से रोक दिया था। पंडित नेहरु इस लडकी की कर्तव्यनिष्ठा एवं समर्पण से बहुत प्रभावित हुए थे तथा टिकट लेकर ही अंदर गये थे।

धीरे-धीरे दुर्गाबाई पूरी तरह से आज़ादी की लड़ाई में कूद गईं और इस दौरान मद्रास में नमक सत्याग्रह का आंदोलन शुरू किया। इस बीच उन्हें तीन बार जेल भी जाना पड़ा। एक बार तो उन्हें मदुरै जेल में एक साल का एकांत कारावास भी झेलना पड़ा था। इसके चलते वे अस्वस्थ हो गईं और कुछ दिन गांधीजी के आश्रम में गांधीजी और कस्तूरबा के साथ भी रहीं। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने सपने को फिर से पूरा करने की ठानी। बहुत तैयारियों के बाद महामना मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से उन्होंने विशिष्टता के साथ मैट्रिक की परीक्षा पास की। इस दौरान उन्होंने मालवीय जी का भी ध्यान खींचा। मालवीय जी की मदद से उन्होंने बीएचयू से ही इंटरमीडिएट भी विशिष्टता के साथ उत्तीर्ण की। इसका पुरस्कार देने के लिए स्वयं महात्मा गांधी को वहां आमंत्रित किया गया था। दुर्गाबाई को अपने हाथों से यह पुरस्कार देते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, ‘तुमने जीवन के इस क्षेत्र में भी कमाल किया है दुर्गा!’

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आगे की पढ़ाई की उनकी इच्छा भी संघर्षमय ही रही और फिर आंध्र विश्वविद्यालय से स्नातक किया। आगे लॉ कॉलेज में पढ़ते हुए ही दुर्गाबाई ने मद्रास में ‘आंध्र महिला सभा’ की नींव रखी। महिलाओं की शिक्षा, रोजगारपरक प्रशिक्षण और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में इस संस्था ने अपनी खास पहचान बनाई और देशभर के कई महत्वपूर्ण व्यक्ति इससे जुड़े जिनमें सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, जयपुर के महाराजा विक्रमदेव वर्मा, मिर्जापुर की महारानी और डॉ. विधानचंद्र रॉय प्रमुख थे। 1946 में मद्रास में ‘आंध्र महिला सभा’ के नए भवन की नींव रखने स्वयं महात्मा गांधी गए थे। उसी साल दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में योगदान के लिए महात्मा गांधी के हाथों ही उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया।

बाल विवाह को थोड़ी समझ होते ही इसे नकार देने वाली दुर्गाबाई ने दूसरा विवाह चिंतामण द्वारकानाथ देशमुख से किया। अत्यंत मेधावी और ICS रहे देशमुख रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के पहले भारतीय गवर्नर थे। बाद में वे भारत के द्वितीय वित्त मंत्री भी बने। योजना आयोग की स्थापना के समय से ही वे इसके सदस्य बने। विवाह से ठीक पहले दुर्गाबाई योजना आयोग से अपना इस्तीफा लेकर नेहरू जी के पास गई थीं कि पति-पत्नी का एक साथ योजना आयोग में रहना ठीक नहीं होगा। इस पर नेहरू जी ने इस्तीफा नामंजूर करते हुए कहा था कि योजना आयोग में तुम्हारी नियक्ति देशमुख ने नहीं, मैंने की है। नेहरू जी ने ही इनके विवाह में प्रथम गवाह की भूमिका भी निभाई थी।


आज़ादी के बाद संविधान सभा की गिनी-चुनी महिला सदस्यों में दुर्गाबाई प्रमुख थीं और इसके सभापति के पैनल में वे अकेली महिला थीं। संविधान सभा और बाद में अंतरिम सरकार में होने वाली बहसों में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। खासकर वंचितों और महिलाओं के अधिकारों और बजटीय प्रावधानों के लिए वे मंत्रियों को परेशान करके रखती थीं। दुर्गाबाई को सरदार पटेल का भी बहुत स्नेह प्राप्त था।

दुर्गाबाई देशमुख वह नारी-मुक्तिवादी महिला हैं, जिन्होंने बतौर अस्थायी सांसद संविधान सभा में कम-से-कम 750 संशोधन प्रस्ताव रखे।

संचालन समिति की सदस्य होने के नाते, संविधान सभा की बहसों में उन्होंने मुखर रूप से हिन्दू कोड बिल के तहत महिलाओं के लिए संपत्ति के अधिकार की पैरवी की। इसके अलावा उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, हिन्दुस्तानी (हिंदी और उर्दू भाषा का मिश्रण) भाषा का राष्ट्रभाषा के तौर पर चयन और राज्य परिषद की सीट के लिए उम्र सीमा 35 साल से कम करके 30 साल करने का भी समर्थन किया।

भारत में लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के लिए 1958 में गठित ‘नेशनल काउंसिल फॉर वीमेंस एजुकेशन’ की पहली अध्यक्ष दुर्गाबाई देशमुख को ही बनाया गया था। भारतीय न्यायपालिका में ‘फैमिली कोर्ट’ की व्यवस्था लाने का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है। सामाजिक शोध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली नई दिल्ली स्थित संस्था ‘काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट’ की स्थापना भी उन्होंने ही की थी।

उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर नई दिल्ली में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और काउंसिल ऑफ सोशल डेवलपमेंट एंड पॉपुलेशन काउंसिल ऑफ इंडिया की कल्पना की।

गांधी जी के विचारों से प्रभावित, उनके प्रति समर्पित दुर्गाबाई जी का जीवन इस बात की मिसाल है कि गाँधीविचार स्त्री अधिकारों की राह में बाधा नहीं है। जिनकी नजर में जिस कारण से है, वो अलग बात है। 


नारी मुक्ति की दुकान चलाने वाले अधिकांश वर्तमान चेहरे जो करें-कहें, भविष्य के चेहरे जब दिल्ली में पिंक लाइन के साउथ कैम्पस मेट्रो स्टेशन जिसका नाम दुर्गाबाई देशमुख रखा गया है के समीप से गुजरें तो जरा एक बार उन्हें जरूर याद कर लें, आपके आसपास इनसे अंजान बच्चे हों तो उन्हें भी बताएं। वर्ना कोई पुराना सा नाम लगते कोई मॉडर्न नाम इसकी जगह ले लेगा पता भी न चलेगा।  

(संदर्भ तथा तस्वीरें इंटरनेट से संकलित)

Thursday, July 8, 2021

गांधीवाद की छुवन के प्रभाव को जन-जन तक पहुंचाने वाले गिरिराज किशोर

 

आज प्रख्यात साहित्यकार गिरिराज किशोर जी की जन्मतिथि है।



गांधी जी की खुद लिखी आत्मकथा और पुस्तकों के बाद भी यदि उनके बारे में जानने के लिए कोई अपरिहार्य पुस्तक है तो उनमें एक सर्वोपरि स्थान 'पहला गिरमिटिया' का है। एक लेखक के रूप में उनकी अपनी ही पहचान थी और अपनी रचना 'ढ़ाई घर' के लिए वो 'साहित्य अकादमी' से सम्मानित भी हो चुके थे।


शायद दैनंदिन गांधी जी की किसी-न-किसी रूप में वैचारिक हत्या किये जाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने उन्हें गांधी जी को अपनी अप्रतिम रचना का विषय बनाने को प्रेरित किया। इस विषय पर लेखन के लिए तथ्यों के संग्रह के जुनून ने उन्हें गांधी जी से जुड़े देश-विदेश के कई स्थानों की अथक यात्रा करवाई। आखिरकार आठ-नौ वर्षों के अथक परिश्रम के पश्चात नौ सौ पृष्ठों का यह दीर्घ उपन्यास हिंदी साहित्य को प्राप्त हुआ और एक धरोहर के रूप में संरक्षित हो गया। 


गांधी जी के भाव किसी को स्पर्श कर दें तो उसका जीवन कैसे प्रभावित हो सकता है, गिरिराज जी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण थे। शायद इन दोनों के मध्य भी कोई 'गिरमिट' हो गया रहा हो!


उपन्यास की रचना प्रक्रिया के दौरान  लेखक शैलेश मटियानी जी ने उनसे कहा था, 'गिरिराज जी, गाँधीजी की लाठी लगने की बात है, अगर छू गई तो उपन्यास पूरा हो जाएगा...!' और शायद यह गांधी जी का दिव्य स्पर्श या अदृश्य चयन रहा हो जिसने इस युग के एक जरुरी कार्य के लिए अपने एक सुपात्र का चयन किया और उसने अपने दायित्व का बखूबी निर्वहन भी किया। 


गिरिराज जी का काम यहीं नहीं रुका। 'पहला गिरमिटिया' के कथानक को संपूर्णता देने के लिए उन्होंने 'बा' उपन्यास की भी रचना की जो उनके जीवन पर भी गहन शोध पर आधारित था। 


गांधी जी पर दीर्घ शोध के बावजूद वो गांधीवाद के अंध अनुयायी नहीं थे और इसे लेकर उनके कुछ संशय भी थे, जो वो स्पष्ट प्रकट करते भी रहते थे। उनका यह गुण भी तो गांधी जी के प्रिय गुणों में ही था।


गांधी जी के नेताजी के साथ आधारहीन बातें तो खूब फैलाई जाती हैं, पर गिरिराज किशोर जी द्वारा ही उद्धृत एक प्रसंग उनके घरेलू रिश्तों को भी सामने लाता है। 


"सुभाषचंद्र बोस आइसीएस के बाद जब भारत आए तो सबसे पहले वे गांधी जी से मिलने आश्रम गए। 'महानायक' में भी इस घटना का उल्लेख है। सुभाष बाबू चाय पीते थे। आश्रम में चाय प्रतिबंधित थी। बा उन्हें रसोई में बुलाकर चाय पिला देती थीं। एक दिन जब बा चाय दे रही थीं, तो बापू आ गए। वे बोले कि आश्रम में चाय पीने पर प्रतिबंध है। बा ने जवाब दिया कि आश्रमवासियों के लिए है, सुभाष अति‌थि हैं। उन पर प्रतिबंध लागू नहीं होता। बापू कस्तूर की तरफ देखने लगे। कस्तूरबा ने कहा रसोई पर मेरा अधिकार है... बापू चुपचाप चले गए।"


गिरिराज जी कहते थे कि गांधी जी के बारे में बहुत गलत बातें फैलाई जा रही हैं, जिनके प्रति जागरूकता जरूरी है।


उनकी इस बात को आज और भी गंभीरता से लिये जाने की जरूरत है। 

Friday, June 11, 2021

7 जून: महात्मा गांधी का प्रिटोरिया में आत्मसाक्षात्कार की रात

1893 की 7 जून ही वह तारीख़ थी जब नियति ने मोहनदास करमचंद गांधी को अपने जीवन के वास्तविक अर्थ की तलाश में आगे बढ़ने को प्रवृत्त किया था, या यूं कहें कि उन्हीं की मान्यतानुसार ईश्वर ने अपने काम के लिए उन्हें चुन लिया था।

एक दुबला-पतला कमजोर व्यक्ति, धार्मिक एवं अन्य मानसिक बेड़ियों में जकड़ा हुआ भी, एक साम्राज्यवादी देश के उपनिवेश के सामान्य से निवासी ने शायद ही कभी सोचा हो कि उसे जीवन में कभी इतनी बड़ी भूमिका भी निभानी होगी। शासक मुल्क की श्रेष्ठता से प्रभावित वह भी तो उसकी भाषा, तौर-तरीके, रंग-ढ़ंग सीखने की ही कोशिश कर रहा था। उस समाज में शामिल होने के लिये आवश्यक गुणों को सीखने के प्रयास का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया ही है।


बैरिस्टर बन कर उसे महसूस हुआ होगा कि वो अब उस वर्ग के और करीब आ गया है। लेकिन हमेशा ट्रेन के फर्स्ट क्लास में सफ़र करने वाले इस युवा वकील को टिकट और सारे अधिकार रहते प्रिटोरिया में जो अनुभव हुए उसने इस साम्राज्य के प्रति अब तक की धारणा को पूरी तरह बदल दिया।



वो समझ गए कि शासक और शासित में जमीन-आसमान का अंतर है, उनके रंगभेद की भावना कपड़ों और डिग्री के आधार पर भी कोई अंतर नहीं देखती। उनके लिए सभी काले सिर्फ काले हैं और कुछ नहीं।


मेरी नज़र में तो यह रात उनकी समाधि और आत्ममंथन की रात थी। इस रात उनके जीवन में वह प्रकाश आया जिसमें उन्हें अपने जीवन को आगे ले जाने की दिशा मिली।


अपनी आत्मकथा में इस पल को याद करते हुए उन्होंने लिखा कि-
मैंने अपने धर्म का विचार किया : ' या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए , नहीं तो जो अपमान हों उन्हें सहकर प्रिटोरिया पहुँचना चाहिए और मुदकमा खत्म करके देश लौट जाना चाहिए । मुकदमा अधूरा छोड़कर भागना तो नामर्दी होगी । मुझे जो कष्ट सहना पड़ा है , सो तो ऊपरी कष्ट है । वह गहराई तक पैठे हुए महारोग का लक्षण है । यह महारोग है रंग - द्वेष । यदि मुझमें इस गहरे रोग को मिटाने की शक्ति हो , तो उस शक्ति का उपयोग मुझे करना चाहिए । ऐसा करते हुए स्वयं जो कष्ट सहने पड़ें सो सब सहने चाहिए और उनका विरोध रंग - द्वेष को मिटाने की दृष्टि से ही करना चाहिए । '
लक्ष्य के प्रति निश्चय तो वो कर ही चुके थे मगर नियति ने उन्हें शासकों की मानसिकता से परिचित करवाने के और भी अवसर रख छोड़े थे।


चार्ल्सटाउन से जोहान्सबर्ग जाते उन्हें घोड़ागाड़ी से जाना था, जिसमें फिर एक बार एक 'कुली' को अन्य यात्रियों के साथ बैठने नहीं दिया गया। उन्हें कोचवान की बगल में बाहर बैठाया गया। इसके बाद भी जब घोड़ा गाड़ी के गोरे अधिकारी को सिगरेट पीने और बाहर की हवा खाने की तलब लगी तो उसने उनसे कोचवान के पैरों के पास बैठने को कहा। इसे उन्होंने स्वीकार करने से इंकार कर दिया। बदले में उन्हें गालियों के साथ बुरी तरह से मारा भी गया, इतना कि अन्य यात्रियों को दया आ गई। यात्रियों की आलोचना ने गोरे को इतना आक्रोशित कर दिया था कि वो उन्हें आगे मजा चखाने की धमकी देता रहा और इधर गांधी जी को यह आशंका हो रही थी कि वो जिंदा मक़ाम तक पहुंच सकेंगे भी या नहीं...!


इन अनुभवों ने रंगभेद और इससे अन्य हिंदुस्तानियों की पीड़ा को समझने के लिए उन्हें और संवेदनशील बनाया। यहां से उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तो आया पर यह भी गौरतलब है कि अपनी, पीड़ा, आक्रोश और क्रोध को उन्होंने मात्र कुछ लोगों से बदला लेने में खर्च नहीं कर दिया, जबकि एक वकील के रूप में भी वो ऐसा कर सकते थे। उन्होंने इसे एक बड़ा रुप दिया। अंग्रेजों से व्यक्तिगत द्वेष न रखते हुए उन्होंने उनके साम्राज्यवादी और रंगभेद नीति का विरोध किया। ट्रेन के तीसरे दर्जे में बैठने को भी उन्होंने प्रतीकात्मक प्रतिरोध का माध्यम बना दिया।


आज उनकी आलोचना इसलिए भी आसान है क्योंकि वैसे किसी आदमी के होने की कल्पना भी वाकई मुश्किल है...

Wednesday, March 17, 2021

दांडी मार्च पर भ्रामक प्रचार और गांधी जी की स्पष्टता

ब्रिटिश हों या कोई भी वर्ग गांधी जी उसकी मनःस्थिति को समझते हुए उसके मानसिक धरातल पर उतर कर उसकी आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करते थे। नमक आंदोलन चूंकि अंग्रेजी शासन से असहयोग की दिशा में पहला बड़ा कदम था इसलिए इसके राजनीतिक प्रभावों को लेकर लोगों के पृथक मत भी थे। ऐसे ही एक मत के रूप में मौलाना शौकत अली ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन स्वराज्य प्राप्ति का नहीं बल्कि मुसलमानों के खिलाफ हिंदू राज्य स्थापित करने का आंदोलन है और इसलिए मुसलमान इससे अलग ही रहें। खबर पढ़ गांधी जी ने उनसे तार के माध्यम से पुष्टि मांगी और मिलने पर इस आंदोलन पर एक गंभीर आरोप के निराकरण का प्रयास किया। यह प्रयास एक आंदोलन को सर्वस्वीकार्य बनाने, सभी की भागीदारी सुनिश्चित करवाने के प्रयास को दर्शाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन न तो हिंदू राज्य की स्थापना के लिए है न मुस्लिमों के खिलाफ। नमक जैसी सामान्य किन्तु सर्व महत्व की सामग्री को एक आंदोलन का माध्यम बनाने की दूरदर्शिता इससे भी झलकती है कि नमक का इस्तेमाल सभी करते हैं और इसपर कर का प्रभाव भी सभी पर पड़ता है। इसी तथ्य को रेखांकित करते उन्होंने कहा कि इस कर का विरोध करने से किसी की हानि होने वाली नहीं है, परंतु यदि यह विरोध सफल हुआ तो इसका लाभ सभी को समान रूप से मिलेगा। हाँ, इस आंदोलन में भाग लेने का अधिकार सभी का है। मौलाना साहब द्वारा उनपर तीखी टिप्पणी का भी स्पष्ट प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण बात कही। 'यंग इंडिया' में अपने एक लेख के माध्यम से उन्होंने कहा कि- "जहां तक खुद मुझसे मौलाना साहब की चिढ़ की बात है इसके संबंध में मुझे ज्यादा-कुछ कहने की जरूरत नहीं है। चूंकि मेरे मन में उनके प्रति कोई चिढ़ नहीं है, इसलिए मैं यह भविष्यवाणी करता हूं कि जब उनका क्रोध शांत हो जाएगा और वे देखेंगे कि उन्होंने मुझे जिन अनेक दोषों का भागी माना है उनका दोषी मैं नहीं हूं तो वे फिर मुझको 'अपनी उसी जेब' में रख लेंगे जिस जेब में रहने का सौभाग्य मुझे मानो अभी कल तक प्राप्त था। क्योंकि उनकी जेब से मैं खुद बाहर नहीं आया हूँ। उन्होंने ही मुझे उसमें से निकाल फेंका है। मैं तो आज भी वही नन्हा-सा आदमी हूं जो 1921 में था। अंग्रेजों के प्रतिनिधियों ने हमारे खिलाफ जो ढेर सारे अन्याय किए हैं उस ढेर में अंग्रेज लोग भले ही और भी वृद्धि कर डालें, किन्तु मैं उनका शत्रु नहीं बन सकता। इसी प्रकार मैं मुसलमानों का भी दुश्मन कभी नहीं बन सकता, चाहे उनमें से कोई एक या बहुत-से लोग मेरे अथवा मेरे लोगों के साथ चाहे जैसा व्यवहार करें। मनुष्य की कमियों से मैं इतनी अच्छी तरह वाकिफ हूं कि किसी भी आदमी के खिलाफ, चाहे वह कुछ भी करे, मेरे मन में चिढ़ हो ही नहीं सकती। मेरा उपचार तो यह है कि जहां-कहीं बुराई दिखाई दे, उसे दूर करने की कोशिश करूँ और जिस प्रकार मैं नहीं चाहूंगा कि मुझसे बार-बार जो गलतियां होती हैं उनके लिए कोई मुझे चोट पहुंचाए उसी प्रकार से मैं खुद भी बुराई करनेवालों को चोट पहुंचाना नहीं चाहूंगा।

Monday, March 15, 2021

दांडी यात्रा की वर्षगांठ

आजादी की 75 वीं सालगिरह पर आयोजित 'अमृत महोत्सव' की शृंखला में पूरे देश में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे। इस कड़ी में मेरा भी एक अंशदान गांधी जी, दांडी यात्रा और आजादी के आंदोलन से जुड़े कुछ और विषयों पर चर्चा का भी... गांधी जी किसी भी कार्य में स्पष्टवादिता के हिमायती थे। उनकी यही स्पष्टता उनके आंदोलनों की तैयारियों में भी झलकती थी। नमक आंदोलन या दांडी यात्रा आरम्भ करने से पूर्व भी उन्होंने 2 मार्च को वायसरॉय लॉर्ड इरविन को पत्र लिखा। पत्र के आरंभ में उन्होंने आंदोलन से पूर्व समझौते का रास्ता निकल आने के प्रयास का जिक्र किया। इसी पत्र में उन्होनें समस्त अंग्रेजों से नहीं बल्कि अंग्रेजी शासन की शोषण प्रणाली से आई दरिद्रता के प्रति अपनी नाराजगी का जिक्र किया।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वर्तमान सरकार दुनिया में सबसे ख़र्चीली है और इसे बनाये रखने की गरज से ही ये सारे अन्याय किये जा रहे हैं। जिस देश में हर एक आदमी की औसत रोजाना आमदनी दो आने से भी कम है उसमें आपको रोजाना 700 रु से भी अधिक मिलते हैं। उधर इंग्लैंड के बाशिंदों की औसत दैनिक आय लगभग दो रु है और वहां के प्रधानमंत्री को रोजाना सिर्फ 180 ही मिलते हैं। इस तरह आप अपनी तनख्वाह के रूप में 5000 से अधिक भारतीयों की औसत कमाई का हिस्सा ले लेते हैं, उधर इंग्लैंड के प्रधानमंत्री सिर्फ 90 अंग्रेजों की कमाई ही लेते हैं।... एक कठोर लेकिन सच्ची हकीकत को ठीक से समझाने के लिए मुझे आपका व्यक्तिगत उदाहरण पेश करना पड़ा है, नहीं तो निजी तौर पर मेरे दिल में आपके लिए इतनी इज्जत है कि मैं ऐसी कोई बात आपके बारे में नहीं कहना चाहूंगा जिससे आपके दिल को ठेस पहुंचे।..." और फिर प्रत्युत्तर में उन्हें वायसराय के निजी सचिव का पत्र मिला जिसमें उन्होंने लिखा कि उन्हें यह जानकर बहुत दुख हुआ कि आप एक ऐसा रास्ता अख्तियार करने जा रहे हैं जिससे स्पष्टतः कानून भंग होगा और सार्वजनिक शांति खतरे में पड़ जाएगी। प्रतिक्रिया में गांधीजी का विचार था कि- "...यदि वायसरॉय चाहते तो गरीबों को नमक पर जो कर चुकाना पड़ता है, उसे समाप्त करके मुझे निष्क्रिय बना दे सकते थे। इस कर को चुकाने में उन्हें प्रति वर्ष 5 आने अर्थात लगभग अपनी तीन दिन की कमाई देनी पड़ती है। मैं तो नहीं जानता कि भारत के अलावा किसी और देश में भी किसी को यदि उसकी सालाना आमदनी 360 रु हो तो 3 रुपये कर स्वरूप दे देने पड़ते हों।... वे उस राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आसानी से हार नहीं मानता, सहज ही अपने किए पर पश्चाताप नहीं करता। अनुनय- विनय से उसका हृदय नहीं पिघलता। शारीरिक शक्ति का दबदबा वह तुरंत स्वीकार करता है। वह मुक्केबाजी के किसी दंगल को घंटों तक सांस रोक कर बिना थके-ऊबे हुए देख सकता है।... हम चाहे जितनी जोरदार और कायल करने वाली दलील दें वह उससे प्रभावित होकर उन करोड़ों रुपयों की ओर से मुंह नहीं मोड़ सकता जो वह प्रतिवर्ष भारत से लूट कर ले जाता है। सो वायसरॉय महोदय के उत्तर से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।..." और फिर उस महान पदयात्रा के आह्वान का वक्त भी आ गया। साबरमती आश्रमवासियों और अपने सहयात्रियों को उन्होंने संबोधित करते हुए कहा- "...अपने सिर पर भारी जिम्मेवारी लेकर रवाना होने वाले हम आश्रमवासियों के पास एक ही पूंजी है। हम विद्वता की डींग तो हांक नहीं सकते। हमने जो व्रत लिए हैं और आश्रम जीवन की प्रतिज्ञा की है, हमें उन व्रतों का ही पालन करते रहना है। ये 72 लोग आश्रम-नियमावली को फिर से जांच लें और अपने जाने, न जाने की बात पर विचार कर लें। जिन आश्रमवासियों का कोई आश्रित है उसके लिए उन्हें आश्रम से पैसा नहीं मिल सकता। आश्रम के भरोसे किसी को इस लड़ाई में भाग नहीं लेना चाहिए। यह लड़ाई नाटक नहीं है; बल्कि यह आखिरी लड़ाई है। यदि उपद्रव हुआ तो हम अपने ही लोगों के हाथों मारे जा सकते हैं। उस हालत में भी हम तो सत्याग्रही के नाते अपना काम पूरा कर चुके होंगे... यदि हममें इतनी शक्ति न हो तो हमें इस लड़ाई में भाग नहीं लेना चाहिए। ... आप या तो मर कर या स्वराज्य लेकर ही लौटेंगे... यदि आश्रम में आग लग जाए तो भी हम वापस नहीं लौट सकते। केवल वही लोग इस कूच में भाग ले सकते हैं जिनका अपने सगे- संबंधियों के प्रति कोई विशेष कर्तव्य नहीं है।... हम जीवन-मरण का धर्मयुद्ध करने जा रहे हैं, एक व्यापक यज्ञ करने जा रहे हैं, जिसमें हम अपनी आहुति दे देना चाहते हैं। यदि आप लोग अक्षम सिद्ध होंगे तो लज्जा का भागी मैं होऊंगा, आप लोग नहीं। मुझे भगवान ने जो शक्ति दी है वह आप सब में भी है। आत्मा-मात्र एक है। मेरी आत्मा जागृत हो चुकी है, अन्य लोगों की आंशिक रूप से जागृत हुई है।"

Sunday, November 22, 2020

गांधी मार्ग की साधिका मीरा बेन

 


आज 'मीरा बेन' के नाम से प्रसिद्ध मेडेलीन स्लेड का जन्मदिन है। उन्हें यह नाम महात्मा गांधी ने ही दिया था। 

इंग्लैंड के अति संभ्रांत व संपन्न परिवार में 22 नवंबर 1892 को जिस मेडेलीन स्लेड का जन्म हुआ, उन्हें बापू ने 1925 में मीरा बहन बना दिया । पिता सर एडमंड स्लेड नौसेना के उच्चाधिकारी थे । बाद में वे कमांडर-इन-चीफ भी बनाए गए । जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, मेडेलीन उनसे विरक्त रहती थी। आडंबर उन्हें नहीं भाता था।



अपनी आत्मकथा The Spiritual Pilgrimage  में वे लिखती हैं: “पांच साल की उम्र से ही कभी किसी पंछी की आवाज या पेड़ों की सरसराहट मुझे कहीं दूर ले जाती थी । मैं किसी ‘अज्ञात प्रेरणा’ के वशीभूत उस छुपे सत्य को खोजने घोड़े की पीठ पर बैठ, अपने नाना के गांव वाले विशाल घर से खेतों, जंगलों, नदियों और सागर के आसपास जाकर प्रकृति से अपना नाता जोड़ा करती थी । मुझे उस ‘अज्ञात’ में भय के बजाय अपार आनंद का अनुभव होता !”

यही अज्ञात की तलाश उन्हें कई मोड़ों से होते भारत ले आई और महात्मा गांधी से जोड़ी; जो जुड़ाव जीवनपर्यंत बना रहा। 

मीरा का सारा जीवन बापूमय था और बापू के लोग ही उनके अपने संगी-साथी थे । डॉ. सुशीला नैयर उनके सबसे निकट थीं, जिनके साथ वे जेल में भी रही थीं । महादेव देसाई ने लिखा है : लंदन में राजसी ठाट में पली यह युवती गांधीजी के प्रति जिस निष्ठा और समर्पण से अपना जीवन बदलने में सफल रही, वैसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है। उन्होंने भारतीय गांवों में लंबे समय तक मानव मल की प्रत्यक्ष सफाई ही नहीं की बल्कि नया आदमी बनाने के काम मैं भी जुटी रहीं। वे बहुत ही सौम्य और शालीन थीं और बेहद निडर थीं। शराबबंदी के अभियान में शराबी जब उनके साथ बुरा बरताव करते थे तब उनकी शालीनता और दृढ़ता देखते बनती थीं। बारिश के दिनों में भी वे टूटी-फूटी झोंपड़ी में शांति से रहती थीं। वे अपना डेरा-डंडा संभाल कर सतत चलती रहने वाली किसी ध्यानमग्न साधिका-सी लगती थीं।”



1925 से 1944 तक, लगातार 20 साल वे बापू के साथ साबरमती और सेवाग्राम आश्रमों में रहीं । 1945 से 1958 तक 14 साल वे उत्तर भारत के हिमालय के इलाकों में रहीं। 1956 में कश्मीर से लौटकर वे फिर से टिहरी गढ़वाल आ गई। बदलती परिस्थितियों ने उनके कार्यों को प्रभावित किया और उन्होंने हमेशा-हमेशा के लिए भारत छोड़ने का मन बना लिया था। 1958 के अप्रैल में कृष्णमूर्ति गुप्ता को उन्होंने लिखा कि “मुझे एक ‘अनजानी ताकत’ फिर से बुला रही है । मैं इसकी अनसुनी नहीं कर सकती... शायद आज के भारत से ज्यादा बापू के विचारों की जरूरत पश्चिम में है।” 28 जनवरी 1959 को भारत छोड़ने से पहले वे कुछ दिन राष्ट्रपति भवन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ रहीं और फिर इंग्लैंड होती हुई वियना चली गईं। जंगलों के निकट, बिलकुल शांत-एकांत, प्राकृतिक सौंदर्य से भरी वह सुंदर सी जगह आखिरी दिनों तक उनका ठिकाना बनी रही।

गांधी जी ने उनसे जो कहा था, उनके बाद वही शब्द उनके साथ रहे- “मेरी चिंता न करना। ईश्वर पर भरोसा रखना। वही मुझे बनाएगा या बिगाड़ेगा। वही तो सब कुछ बनाता है!”

स्रोत: Gandhian Institutions - Bombay Sarvodaya Mandal & Gandhi Research Foundation


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