मेरे ब्लॉग 'धरोहर' पर ताजा प्रविष्टियाँ
Sunday, March 13, 2011
गाँधी पहेली श्रृंखला 6
Sunday, March 6, 2011
गाँधी पहेली श्रृंखला 5
Sunday, February 27, 2011
गाँधी पहेली 4
Sunday, February 20, 2011
Gandhi Paheli Shrinkhala 3 (Bina sahi javab ke 2nd Paheli !)
dhanyavad. Internet network ki asuvidha ki vajah se mobile se hi post
karne ko vivash hun, aasha hai sahayog denge.
Afsos hai ki is baar sahi jawab kisi ka nahin raha !
Shakahar par aadharit jis pustak ne Gandhi ji ko sarvadhik prabhavit
kiya tha, vo thi 'Salt' ki ' Plea for Vejeterianijm'.
'Unto the Last' ne Gandhiji mein Trustiship aur Sahkarita ki bhavana
ko viksit karne mein yogdaan diya tha.
Is shrinkhala ka agla prashn hai - ''Dakshin Africa mein raajneetik
rup se ek naye sanche mein dhal chuke Gandhiji apna pravas sanpann kar
vapas Bharat kab laute ?
1. 9/01/1915, 2. 26/01/1915, 3. 30/01/1915, 4. 23/01/1915
Uttar sada ki bhanti agle ravivar subah 10 AM par.
Sunday, February 13, 2011
गाँधी पहेली 2
इंटरनेट की असुविधा की वजह से विस्तार से पहेली का उत्तर नहीं दे पा रहा हूँ. पहेली का सही उत्तर है - 'उत्तमचंद गाँधी'; जो कि पोरबंदर के दीवान भी रह चुके थे.
सभी विजेताओं को बधाई तथा प्रतिभागियों का धन्यवाद.
इस श्रंखला का अगला प्रश्न है -
शाकाहार पर आधारित किस पुस्तक ने गांधीजी को सर्वाधिक प्रभावित किया था ?
(i) साल्ट की ' प्ली फॉर वेजिटेरियनिज्म '
(iii) विलियम की 'द एथिक्स ऑफ डाइट'
(iv) जौन रस्किन की 'अन्टू दी लास्ट'
उत्तर अगले रविवार, अगले प्रश्न के साथ सुबह दस बजे.
Sunday, February 6, 2011
रविवारीय गाँधी पहेली (1)
Monday, January 3, 2011
क्रन्तिकारी - जो हो गए देश पर फ़िदा

बीता दिसंबर माह अपने साथ आजादी के दीवाने दो अमर शहीदों खुदीराम बोस का जन्मदिवस और पं. राम प्रसाद बिस्मिल जी की पुण्यतिथी को ख़ामोशी से याद करता गुजर गया. ब्रिटिश अधिकारी किग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंकने, जिस वजह से 3 लोग मारे गए थे की सजा के रूप में आनन – फानन में अदालती कार्यवाही पूरी कर मात्र 18 वर्ष की आयु में इन्हें फांसी की सजा दे दी गई थी. कहते हैं मृत्यु से पूर्व इन्होने अपनी माँ को आश्वस्त किया था कि 10 माह 10 दिन पश्चात ये पुनः जन्म लेंगे, और तब यदि पहचान सको तो गरदन पर बने निशान से पहचान लेना. इस मार्मिक प्रसंग की पृष्ठभूमि में प्रख्यात कवि काजी नसरुल इस्लाम ने 18 वर्षों के बाद भी अपनी पंक्तियों के माध्यम से इन्हें पुनः याद करने का एक प्रयास किया था.

ऐसे ही एक क्रन्तिकारी अमर शहीद पं. राम प्रसाद बिस्मिल जी की पुण्यतिथी (18/12/1927) भी बिना किसी शोर - गुल के गुजर गई. काकोरी षड्यंत्र केस में फांसी की सजा पाए इस क्रन्तिकारी कवि ने अपनी कालकोठरी की दीवारों पर चंद पंक्तियाँ लिखी थीं –
“महसूस हो रहे हैं बड़े फ़ना के झोंके,
खुलने लगे हैं मुझपर असरार जिंदगी के;
बारे आलम उठाया रंगे निशान देखा,
आये नहीं हैं यूँ ही अंदाज बेहिसी के;
वफ़ा पर दिल को सदके जान को नज़ारे जफा कर दे,
मुहब्बत में यह लाजिमी है कि जो कुछ हो फ़िदा कर दे. “
(कामना करता हूँ कि शायद राजनीति के शातिर खिलाडी इन पंक्तियों में छुपे भावार्थ को समझ सकें)
आइये, इन अमर शहीदों को कोटिशः नमन करते हुए ऐसा परिवेश बनाने का प्रयास करें जिसमें ऐसे क्रांतिकारियों के व्यक्तित्व तथा योगदान का समग्र मूल्यांकन किया जा सके; ताकि कतिपय स्वार्थी तत्वों तथा क्षद्म राष्ट्रवादियों द्वारा इन्हें क्षेत्रीयता, जातीयता तथा क्षुद्र राजनीतिक खानों में कैद करने के संकीर्ण प्रयासों को नकारा जा सके. हमारे देश का इतिहास, संस्कृति तथा विरासत किसी समूह विशेष की कॉपीराइट संपत्ति नहीं है. यह हमारी साझी विरासत है, और बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के भी इसे संभालने में इस देश की जनता स्वयं भी सक्षम है.

