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Tuesday, July 7, 2009

गांधीजी के गुरु रूप का स्मरण

गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर शिक्षा और शिक्षक पर गांधीजी के विचारों और एक शिक्षक के रूप में उनके अनुभवों का स्मरण करने की इच्छा आपके साथ भी बाँट रहा हूँ.
द. अफ्रीका प्रवास के दौरान 'टॉलसटॉय आश्रम' में निवास करने वाले बच्चों के शिक्षण के लिए उन्हें शिक्षक की भूमिका भी निभानी पड़ी थी. इस अनुभव ने शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें कुछ और प्रयोग तथा मौलिक चिंतन विकसित करने में भी सहयोग दिया. धन, शिक्षकों की कमी तो उनके सामने थी ही, जो शिक्षा के प्रचलित स्वरुप को व्यवहार में लाने में बाधा बन रही थी. जैसाकि गांधीजी स्वयं भी किताबी शिक्षा से चारित्रिक शिक्षा को ज्यादा महत्व देते थे, उन्होंने यही प्रयास यहाँ भी आरम्भ किया.
अक्षर ज्ञान, चारित्रिक शिक्षा के साथ शारीरिक शिक्षा भी उनके लिए समान महत्व रखते थे. इसके अलावे बच्चों को स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षित करना भी उन्होंने जरुरी समझा.
गांधीजी के ही शब्दों में- "टॉल्सटॉय आश्रम मे शुरू से ही रिवाज डाला गया था कि जिस काम को हम शिक्षक न करें, वह बालको से न कराया जाय, और बालक जिस काम मे लगे हो, उसमे उनके साथ उसी काम को करनेवाला एक शिक्षक हमेशा रहे. इसलिए बालको ने कुछ सीखा, उमंग के साथ सीखा."
विद्यार्थियों के चारित्रिक और आत्मिक विकास के लिए उन्होंने बुनियादी धार्मिक शिक्षा देना जरुरी समझा. (क्या धर्मनिरपेक्ष देश में छात्रों को हर धर्म की बुनियादी शिक्षा उपलब्ध कराना समरसता का आधार नहीं बनता !)
किन्तु उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे वो बुद्धि की शिक्षा का अंग मानते हैं और आत्मा की शिक्षा एक बिल्कुल भिन्न विभाग है. इस आत्मिक शिक्षा के लिए उनका मानना था कि "...आत्मा की कसरत शिक्षक के आचरण द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है...मैं स्वयं झूठ बोलूँ और अपने शिष्यो को सच्चा बनने का प्रयत्न करूँ, तो वह व्यर्थ ही होगा.  डरपोक शिक्षक शिष्यो को वीरता नही सिखा सकता.  व्यभिचारी शिक्षक शिष्यो को संयम किस प्रकार सिखायेगा ? मैने देखा कि मुझे अपने पास रहने वाले युवको और युवतियो के सम्मुख पदार्थपाठ-सा बन कर रहना चाहिये. इस कारण मेरे शिष्य मेरे शिक्षक बने. मै यह समझा कि मुझे अपने लिए नही , बल्कि उनके लिए अच्छा बनना और रहना चाहिये. अतएव कहा जा सकता है कि टॉल्सटॉय आश्रम का मेरा अधिकतर संयम इन युवको और युवतियों की बदौलत था."
(नैतिक और चारित्रिक शिक्षा के लिए पाठ्यपुस्तकों का बोझ बढ़ाने के समर्थक गांधीजी के इन विचारों पर गौर क्यों नहीं करते !)
शिक्षा के संबंध में गांधीजी के विचारों को अंशतः भी अपनाया जाता तो देश को आज कई सामाजिक और नैतिक समस्याओं से न जूझना पड़ता.

तस्वीर- 'टॉलसटॉय आश्रम' में गांधीजी (साभार गूगल)

Wednesday, May 13, 2009

"गांधीजी से डर किन्हें है"

पिछले दिनों कनिष्क कश्यप जी द्वारा एक नए सामुदायिक ब्लॉग 'कबीरा खडा बाजार में' से जुड़ने का आमंत्रण मिला। उपभोक्तावाद जैसे विषयों के विरुद्ध प्रतिवाद मजबूत करने के इस प्रयास से जुड़ना मैंने स्वीकार कर लिया, और अपनी एक पोस्ट द्वारा गांधीजी के विचारों को उपभोक्तावाद के लिए खतरा बताने का एक प्रयास किया है, "गांधीजी से डर किन्हें है ?"। इस प्रयास पर आपकी प्रतिक्रिया की भी अपेक्षा रहेगी।

Thursday, May 7, 2009

'गाँधीजी' और अपनी बात

यह ब्लॉग शुरू करने का मेरा उद्देश्य था कि गांधीजी के विचारों को आज के परिप्रेक्ष्य में रख पाठकों को खुद ही उनकी प्रासंगिकता के सम्बन्ध में निर्णय लेने का विकल्प दे सकूँ. फिर भी बीच -बीच में स्वयं भी आपसे मुखातिब होने की स्थितियां आ ही जाती हैं, और यह परस्पर संवाद के दृष्टिकोण से संभवतः उचित भी है.


प्रतिष्ठित पत्रिका 'आजकल' के जनवरी 2009 अंक में श्री महेंद्र राजा जैन जी का लेख 'महात्मा गाँधी- पिता बनाम राष्ट्रपिता' प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने फिल्म 'गाँधी: माई फादर' के माध्यमसे गांधीजी के व्यक्तित्व के एक जटिल पहलू की समीक्षा का प्रयास किया था. निश्चय ही फिल्म काफी साहसिक और भावपूर्ण है, तथा इसकी समीक्षा भी अच्छी की गई है. किन्तु क्या सिर्फ एक फिल्म गाँधी जी जैसे व्यक्तित्व का आईना हो सकती है! एक राष्ट्रपिता की सफलता के पीछे छुपी एक पिता की असफलता को हाईलाइट करने पर आज के प्रगतिशीलों (!) का इतना आग्रह क्यों है ? गांधीजी की जीवन यात्रा एक आम मानव से महामानव बनने की यात्रा है, जो उनके 'सत्य के साथ प्रयोग' से ही स्पष्ट है. तो फिर उनके व्यक्तिगत जीवन में जबरन तांक-झाँक कर जुगुप्सा जगाने और कहीं छुटी गर्द को ज़माने को चीख-चीख कर दिखाने का औचित्य समझ नहीं आता. यदि आप उस धुल को साफ़ नहीं कर सकते तो और कीचड़ फेंक उसका मजमा लगाने का प्रयास क्यों ? व्यावहारिक रूप से भी देखें तो हरिलाल की असफलता के लिए क्या सिर्फ गांधीजी ही दोषी थे! तब फिर आज के अन्य स्टार पिताओं के गुमनाम सुपुत्रों के बारे में क्या राय है आपकी?


अपनी प्रतिक्रिया मैंने पत्र के माध्यम से संपादक तक पहुंचाई थी जो मई, 2009 अंक में प्रकाशित की गई है। मैंने इसमें यह भी कहा कि गांधीजी पर गोली दागने का सिलसिला 60 साल बाद भी जारी है, जो दुखद है.


इस पोस्ट तथा पत्र में यह मेरी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है और इससे किसी को ठेस पहुँचने की स्थिति में मुझे खेद भी है, किन्तु जहाँ तक मैं समझता हूँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार गांधीजी के समर्थकों को भी उतना ही है.....

Tuesday, April 7, 2009

गांधीजी के 'दांडी मार्च' को याद करते हुए


भारत के स्वतंत्रता संघर्ष से आम आदमी की रही दुरी इसे अब तक तार्किक परिणति तक पहुँचने से रोकती आ रही थी. गांधीजी के 'नमक आन्दोलन' ने इस संग्राम को बड़े नेताओं के दायरे से मुक्त कर जन-जन तक पहुंचा दिया. 
 
'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' के एक अंग के रूप में गांधीजी ने 12 मार्च, 1930 को मात्र 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से 'दांडी यात्रा' आरम्भ की. ब्रिटिश हुकूमत के लिए यह एक पहेली ही थी कि यह यात्रा जिसका अंत नमक बनाने से होना था, भला ब्रिटिश साम्राज्य को कैसे प्रभावित कर सकती है!
 
मगर 6 अप्रैल, 1930 को गांधीजी द्वारा एक मुट्ठी नमक अपने हाथों में उठाने के साथ ही करोडों हाथों में यह विश्वास भी आ गया कि अपने हक के लिए हम ब्रिटिश कानून से अहिंसक ढंग से भी टक्कर ले सकते हैं.
 
इस आन्दोलन को अबतक एक मजाक के रूप में ले रही सरकार ने इससे जुड़े सभी बड़े नेताओं को हिरासत में ले लिया, किन्तु यह आन्दोलन अब नेताओं के हाथों में रह ही कहाँ गया था! यह तो एक जनांदोलन बन चूका था.

नमक कानून के भंग होने के साथ ही सारे देश में 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' प्रारंभ हो गया.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने गांधीजी के 'दांडी मार्च' की तुलना नेपोलियन के 'पेरिस मार्च' से की.

इस आन्दोलन की सबसे बड़ी सफलता थी- महिलाओं की सक्रिय भागीदारी.

सफलता-असफलता के दावों-प्रतिदावों तथा विवादों के बावजूद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से आम आदमी को जोड़ने के लिए याद रखा जायेगा- 6 अप्रैल, 1930 का दांडी मार्च' और 'नमक सत्याग्रह'.

तस्वीर- साभार गूगल

Thursday, April 2, 2009

गाँधीजी के 'हिंद-स्वराज' के सौ वर्ष पर

द. अफ्रीका में सत्याग्रह के दौर में गांधीजी ने एक और लन्दन यात्रा की थी. वहां मिले कई क्रन्तिकारी भारतीय नवयुवकों तथा ऐसी ही विचारधारा वाले द. अफ्रीका के एक वर्ग के सवालों के जवाब के रूप में यह पुस्तक 1909 में लिखी गई थी.

 20 अध्यायों में रखे अपने विचारों के माध्यम से गांधीजी ने तथाकथित आधुनिक सभ्यता पर सख्त टिप्पणियां करते हुए अपने सपनों के स्वराज की तस्वीर प्रस्तुत की थी.

सर्वप्रथम यह पुस्तक द. अफ्रीका में छपने वाले साप्ताहिक 'इंडियन ओपिनियन'  में प्रकाशित हुई थी. मूल पुस्तक गुजराती में लिखी गई थी, जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था. प्रत्युत्तर पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित कर दिया गया, क्योंकि गांधीजी को लगा कि अंग्रेज मित्रों को इस किताब में रखे गए विचारों से परिचित करना उनका फर्ज है.

इस पुस्तक के अनूठेपन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गोखले जी ने इसके सम्बन्ध में राय व्यक्त की थी कि - "यह विचार जल्दबाजी में बने हुए हैं, और एक साल भारत में रहने के बाद गांधीजी खुद ही इस पुस्तक का नाश कर देंगे";  लेकिन अपने स्वतंत्रता संघर्ष के 30 साल बाद भी 1938 में पुस्तक के नए संस्करण के प्रकाशन पर गांधीजी ने अपने सन्देश में कहा कि - "यह पुस्तक अगर आज मुझे फिर से लिखनी हो तो कहीं-कहीं मैं इसकी भाषा बदलूँगा, लेकिन....... इन 30 सालों में मुझे इस पुस्तक में बताये हुए विचारों में फेरबदल करने का कुछ भी कारण नहीं मिला."

गांधीजी का मानना था कि- "सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के स्वीकार से अंत में क्या नतीजा आएगा, उसकी तस्वीर इसमें है. इसे पढ़कर इसके सिद्धांतों को स्वीकार करना चाहिए या त्याग, यह तो पाठक ही तय करें. "

तो क्यों न हम अपनी औपचारिक, सालाना, कर्मकांडप्रिय मनोवृत्ति से ही सही किन्तु एक नजर इस सौ साल पुरे करती धरोहर पर भी डाल लें.

Monday, March 23, 2009

क्रांतिकारियों के प्रति गांधीजी के विचार

    आज 23 मार्च है, शहीद दिवस। जिस दिन देश की स्वतंत्रता की बलिवेदी पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया था. उन शहीदों और ऐसे ही अनगिनत बलिदानियों को कोटिशः नमन करते हुए क्रांतिकारियों के प्रति गांधीजी के विचारों को याद करना प्रासंगिक होगा.

    12 फरवरी 1925 को 'यंग इंडिया' में गांधीजी द्वारा प्रस्तुत विचारों का सार आपके समक्ष रख रहा हूँ -

  "मैं क्रांतिकारियों की वीरता और बलिदान की भावना से इंकार नहीं करता। ... एक निर्दोष व्यक्ति का आत्मबलिदान उन लाखों लोगों के बलिदान से ज्यादा असर पैदा करता है जो दूसरों को मारने की क्रिया में मर जाते हैं.

     मैं उनसे धैर्यपूर्वक आग्रह करता हूँ कि वे स्वराज की चिरप्रतीक्षित बाधाओं - चरखों का अपूर्ण प्रचार, हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच मनमुटाव और दलित वर्गों के ऊपर अमानवीय प्रतिबन्ध के प्रति अपना समुचित योगदान करें। यह शायद शानदार काम नहीं है, लेकिन इसके लिए आवश्यक गुण सदा महानतम क्रांतिकारियों में विद्यमान  होते हैं.

     सरफरोशी की तमन्ना से भरकर फांसी के तख्ते पर झूल जाने की अपेक्षा भूखी जनता के बीच उसके साथ-साथ धीरे-धीरे और शानदार न दिखने वाले तरीके से स्वेक्षापूर्वक भुखमरी का शिकार होना हर हालत में ज्यादा वीरतापूर्ण कृत्य है। "

गांधीजी और क्रांतिकारियों के बीच मतभेद के अनावश्यक विवादों में न पड़ते हुए मैं बस यही दोहराना चाहूँगा कि गांधीजी साध्य के साथ साधनों की भी पवित्रता के पक्ष में थे और निश्चित रूप से इसकी अनिवार्यता मौजूदा दौर में और भी शिद्दत से महसूस की जा रही है.

Tuesday, March 3, 2009

मार्टिन लूथर किंग III और गांधीजी

अमेरिकी नागरिक अधिकारों के अप्रतिम योद्धा मार्टिन लूथर किंग II के पुत्र मार्टिन लूथर किंग III अपने पिता की भारत यात्रा की स्मृतियों को पुनर्जीवित करने के लिए भारत यात्रा पर रहे। अपने पिता की ही तरह वो भी गांधीजी के आदर्शों से प्रभावित रहे हैं और वैश्विक शांति की दिशा में अपने पिता के प्रयासों को आगे बढा रहे हैं. इस अवसर पर विविध आयोजनों में गांधीजी और उनके विचारों पर उनकी टिप्पणियों पर एक नजर डालना समीचिन रहेगा.
उन्होंने पुनः यह दोहराया कि किंग II ने युद्ध और सैन्यवाद के विरुद्ध जो अभियान चलाया था उसकी प्रेरणा के स्रोत महात्मा गाँधी ही थे।
उनकी राय में अगर मानवता को बचाना है तो किंग के प्रेम और गांधीजी के सत्याग्रह को अपनाना ही होगा। वर्तमान में जारी हिंसा का हल न सिर्फ प्रतिहिंसा बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से भी हो सकता है. गांधीजी कि तरह वो भी सहमत हैं कि अहिंसा हर धर्म, काल और देश में मौजूद है, अलबत्ता हर देश के अपने गाँधी और किंग होंगे जो वहां कि वस्तुस्थिति के अनुरूप काम करेंगे.
अश्वेतों के संघर्ष में अहिंसा के प्रयोग के लाभ बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे उन्हें श्वेत नागरिकों का दिल जितने और समर्थन का आधार व्यापक बनाने में काफी मदद मिली। जिसका परिणाम द. अफ्रीका में रंगभेद के अंत और अमेरिका में ओबामा की जीत के रूप में भी सामने आया.
गाँधीजी जैसी हस्ती विश्व को सौंपने वाले भारत का आभार प्रकट करते हुए उन्होंने गांधीजी की अमेरिका सहित पुरे विश्व को दी प्रेरणा के लिए कृतज्ञता भी जताई।
उन्होंने कही कि इस ग्रह को और बेहतर बनाने के लिए जरुरी है कि गांधीजी के दर्शन को आत्मसात किया जाये। इस अवसर पर अपने पिता को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने कई देशों की यात्रा एक पर्यटक की तरह की मगर भारत वो एक तीर्थयात्री की तरह आये. आज हम भी और दृढ़प्रतिज्ञ और समर्पण के साथ प्रेम और अहिंसा की भावना लेकर जा रहे हैं अपने देश और सारे विश्व के लिए.
गांधीजी के विचारों के प्रति दुनिया के सर्वशक्तिशाली राष्ट्र के शिखरपुरुषों के ये विचार हमें भी गाँधी विचार के पुनर्मूल्यांकन को प्रेरित करते हैं.
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