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Tuesday, April 7, 2009

गांधीजी के 'दांडी मार्च' को याद करते हुए


भारत के स्वतंत्रता संघर्ष से आम आदमी की रही दुरी इसे अब तक तार्किक परिणति तक पहुँचने से रोकती आ रही थी. गांधीजी के 'नमक आन्दोलन' ने इस संग्राम को बड़े नेताओं के दायरे से मुक्त कर जन-जन तक पहुंचा दिया. 
 
'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' के एक अंग के रूप में गांधीजी ने 12 मार्च, 1930 को मात्र 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से 'दांडी यात्रा' आरम्भ की. ब्रिटिश हुकूमत के लिए यह एक पहेली ही थी कि यह यात्रा जिसका अंत नमक बनाने से होना था, भला ब्रिटिश साम्राज्य को कैसे प्रभावित कर सकती है!
 
मगर 6 अप्रैल, 1930 को गांधीजी द्वारा एक मुट्ठी नमक अपने हाथों में उठाने के साथ ही करोडों हाथों में यह विश्वास भी आ गया कि अपने हक के लिए हम ब्रिटिश कानून से अहिंसक ढंग से भी टक्कर ले सकते हैं.
 
इस आन्दोलन को अबतक एक मजाक के रूप में ले रही सरकार ने इससे जुड़े सभी बड़े नेताओं को हिरासत में ले लिया, किन्तु यह आन्दोलन अब नेताओं के हाथों में रह ही कहाँ गया था! यह तो एक जनांदोलन बन चूका था.

नमक कानून के भंग होने के साथ ही सारे देश में 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' प्रारंभ हो गया.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने गांधीजी के 'दांडी मार्च' की तुलना नेपोलियन के 'पेरिस मार्च' से की.

इस आन्दोलन की सबसे बड़ी सफलता थी- महिलाओं की सक्रिय भागीदारी.

सफलता-असफलता के दावों-प्रतिदावों तथा विवादों के बावजूद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से आम आदमी को जोड़ने के लिए याद रखा जायेगा- 6 अप्रैल, 1930 का दांडी मार्च' और 'नमक सत्याग्रह'.

तस्वीर- साभार गूगल

Thursday, April 2, 2009

गाँधीजी के 'हिंद-स्वराज' के सौ वर्ष पर

द. अफ्रीका में सत्याग्रह के दौर में गांधीजी ने एक और लन्दन यात्रा की थी. वहां मिले कई क्रन्तिकारी भारतीय नवयुवकों तथा ऐसी ही विचारधारा वाले द. अफ्रीका के एक वर्ग के सवालों के जवाब के रूप में यह पुस्तक 1909 में लिखी गई थी.

 20 अध्यायों में रखे अपने विचारों के माध्यम से गांधीजी ने तथाकथित आधुनिक सभ्यता पर सख्त टिप्पणियां करते हुए अपने सपनों के स्वराज की तस्वीर प्रस्तुत की थी.

सर्वप्रथम यह पुस्तक द. अफ्रीका में छपने वाले साप्ताहिक 'इंडियन ओपिनियन'  में प्रकाशित हुई थी. मूल पुस्तक गुजराती में लिखी गई थी, जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था. प्रत्युत्तर पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित कर दिया गया, क्योंकि गांधीजी को लगा कि अंग्रेज मित्रों को इस किताब में रखे गए विचारों से परिचित करना उनका फर्ज है.

इस पुस्तक के अनूठेपन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गोखले जी ने इसके सम्बन्ध में राय व्यक्त की थी कि - "यह विचार जल्दबाजी में बने हुए हैं, और एक साल भारत में रहने के बाद गांधीजी खुद ही इस पुस्तक का नाश कर देंगे";  लेकिन अपने स्वतंत्रता संघर्ष के 30 साल बाद भी 1938 में पुस्तक के नए संस्करण के प्रकाशन पर गांधीजी ने अपने सन्देश में कहा कि - "यह पुस्तक अगर आज मुझे फिर से लिखनी हो तो कहीं-कहीं मैं इसकी भाषा बदलूँगा, लेकिन....... इन 30 सालों में मुझे इस पुस्तक में बताये हुए विचारों में फेरबदल करने का कुछ भी कारण नहीं मिला."

गांधीजी का मानना था कि- "सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के स्वीकार से अंत में क्या नतीजा आएगा, उसकी तस्वीर इसमें है. इसे पढ़कर इसके सिद्धांतों को स्वीकार करना चाहिए या त्याग, यह तो पाठक ही तय करें. "

तो क्यों न हम अपनी औपचारिक, सालाना, कर्मकांडप्रिय मनोवृत्ति से ही सही किन्तु एक नजर इस सौ साल पुरे करती धरोहर पर भी डाल लें.

Monday, March 23, 2009

क्रांतिकारियों के प्रति गांधीजी के विचार

    आज 23 मार्च है, शहीद दिवस। जिस दिन देश की स्वतंत्रता की बलिवेदी पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया था. उन शहीदों और ऐसे ही अनगिनत बलिदानियों को कोटिशः नमन करते हुए क्रांतिकारियों के प्रति गांधीजी के विचारों को याद करना प्रासंगिक होगा.

    12 फरवरी 1925 को 'यंग इंडिया' में गांधीजी द्वारा प्रस्तुत विचारों का सार आपके समक्ष रख रहा हूँ -

  "मैं क्रांतिकारियों की वीरता और बलिदान की भावना से इंकार नहीं करता। ... एक निर्दोष व्यक्ति का आत्मबलिदान उन लाखों लोगों के बलिदान से ज्यादा असर पैदा करता है जो दूसरों को मारने की क्रिया में मर जाते हैं.

     मैं उनसे धैर्यपूर्वक आग्रह करता हूँ कि वे स्वराज की चिरप्रतीक्षित बाधाओं - चरखों का अपूर्ण प्रचार, हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच मनमुटाव और दलित वर्गों के ऊपर अमानवीय प्रतिबन्ध के प्रति अपना समुचित योगदान करें। यह शायद शानदार काम नहीं है, लेकिन इसके लिए आवश्यक गुण सदा महानतम क्रांतिकारियों में विद्यमान  होते हैं.

     सरफरोशी की तमन्ना से भरकर फांसी के तख्ते पर झूल जाने की अपेक्षा भूखी जनता के बीच उसके साथ-साथ धीरे-धीरे और शानदार न दिखने वाले तरीके से स्वेक्षापूर्वक भुखमरी का शिकार होना हर हालत में ज्यादा वीरतापूर्ण कृत्य है। "

गांधीजी और क्रांतिकारियों के बीच मतभेद के अनावश्यक विवादों में न पड़ते हुए मैं बस यही दोहराना चाहूँगा कि गांधीजी साध्य के साथ साधनों की भी पवित्रता के पक्ष में थे और निश्चित रूप से इसकी अनिवार्यता मौजूदा दौर में और भी शिद्दत से महसूस की जा रही है.

Tuesday, March 3, 2009

मार्टिन लूथर किंग III और गांधीजी

अमेरिकी नागरिक अधिकारों के अप्रतिम योद्धा मार्टिन लूथर किंग II के पुत्र मार्टिन लूथर किंग III अपने पिता की भारत यात्रा की स्मृतियों को पुनर्जीवित करने के लिए भारत यात्रा पर रहे। अपने पिता की ही तरह वो भी गांधीजी के आदर्शों से प्रभावित रहे हैं और वैश्विक शांति की दिशा में अपने पिता के प्रयासों को आगे बढा रहे हैं. इस अवसर पर विविध आयोजनों में गांधीजी और उनके विचारों पर उनकी टिप्पणियों पर एक नजर डालना समीचिन रहेगा.
उन्होंने पुनः यह दोहराया कि किंग II ने युद्ध और सैन्यवाद के विरुद्ध जो अभियान चलाया था उसकी प्रेरणा के स्रोत महात्मा गाँधी ही थे।
उनकी राय में अगर मानवता को बचाना है तो किंग के प्रेम और गांधीजी के सत्याग्रह को अपनाना ही होगा। वर्तमान में जारी हिंसा का हल न सिर्फ प्रतिहिंसा बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से भी हो सकता है. गांधीजी कि तरह वो भी सहमत हैं कि अहिंसा हर धर्म, काल और देश में मौजूद है, अलबत्ता हर देश के अपने गाँधी और किंग होंगे जो वहां कि वस्तुस्थिति के अनुरूप काम करेंगे.
अश्वेतों के संघर्ष में अहिंसा के प्रयोग के लाभ बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे उन्हें श्वेत नागरिकों का दिल जितने और समर्थन का आधार व्यापक बनाने में काफी मदद मिली। जिसका परिणाम द. अफ्रीका में रंगभेद के अंत और अमेरिका में ओबामा की जीत के रूप में भी सामने आया.
गाँधीजी जैसी हस्ती विश्व को सौंपने वाले भारत का आभार प्रकट करते हुए उन्होंने गांधीजी की अमेरिका सहित पुरे विश्व को दी प्रेरणा के लिए कृतज्ञता भी जताई।
उन्होंने कही कि इस ग्रह को और बेहतर बनाने के लिए जरुरी है कि गांधीजी के दर्शन को आत्मसात किया जाये। इस अवसर पर अपने पिता को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने कई देशों की यात्रा एक पर्यटक की तरह की मगर भारत वो एक तीर्थयात्री की तरह आये. आज हम भी और दृढ़प्रतिज्ञ और समर्पण के साथ प्रेम और अहिंसा की भावना लेकर जा रहे हैं अपने देश और सारे विश्व के लिए.
गांधीजी के विचारों के प्रति दुनिया के सर्वशक्तिशाली राष्ट्र के शिखरपुरुषों के ये विचार हमें भी गाँधी विचार के पुनर्मूल्यांकन को प्रेरित करते हैं.

Monday, February 16, 2009

मार्टिन लूथर किंग और गांधीजी


  ओबामा की जीत और मार्टिन लूथर किंग III की 13 दिवसीय भारत यात्रा ने आम लोगों में मार्टिन लूथर किंग और गांधीजी के सम्बन्ध में जिज्ञासा जगा दी है. दरअसल मार्टिन III यह यात्रा अपने पिता की 1959 में हुई भारत यात्रा की स्वर्ण जयंती पर उनकी स्मृतियों को पुनर्जीवित करने के लिए कर रहे हैं. मार्टिन लूथर किंग जूनियर "अमेरिका के गाँधी" के रूप में ख्याति प्राप्त हैं, जिन्होंने नीग्रो समुदाय के प्रति भेदभाव के विरुद्ध सफल अहिंसात्मक आन्दोलन का संचालन किया था; जिसकी बुनियाद पर आज अमेरिकी लोकतंत्र गर्व कर रहा है.
  वो गांधीजी की विचारधारा से काफी प्रभावित रहे. अध्ययन काल के दौरान ही उन्होंने गांधीजी के अहिंसक सविनय अवज्ञा आन्दोलन के बारे में सुना. उन्होंने गांधीजी के विचारों पर कुछ अन्य पुस्तकें भी पढीं और आश्वस्त हुए कि सत्य और अहिंसा को नागरिक अधिकार प्राप्त करने के संघर्ष में प्रयोग किया जा सकता है. गांधीजी की इन पंक्तियों ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया कि- " अपनी पीड़ा से हम उन्हें अहसास करा देंगे कि वो अन्याय पर हैं. "
     गांधीजी के सत्याग्रह से ही प्रेरित हो उन्होंने अमेरिका में सावर्जनिक बसों में काले-गोरे भेद के विरुद्ध अपना प्रसिद्ध 'बस बहिष्कार आन्दोलन' (1955) चलाया.
    गांधीजी को और करीब से समझने के विचार के साथ वो 1959 में भारत यात्रा पर भी आए. यहाँ अपने एक रेडियो संदेश में उन्होंने कहा - " वो आश्वस्त हैं कि न्याय और मानवता के संघर्ष में अहिंसक सत्याग्रह आज पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक है." दरअसल गांधीजी के विचारों ने उनके जीवन को प्रभावित करने वाले कुछ बुनियादी तत्व दिए और किंग ने दिखाया कि गाँधीविचार सिर्फ़ सैद्धांतिक ही नहीं बल्कि व्यवहारिक भी हैं. 
     1963 में अपने प्रसिद्द 'वाशिंगटन मार्च' में इन्होने अपना प्रेरक "I Have A Dream" भाषण दिया; जिसमें उन्होंने कालों और गोरों के सहअस्तित्व की अपनी उत्कंठा प्रस्तुत की थी. 
     1964 में उन्हें 'नोबल पुरस्कार' से सम्मानित किया गया.
     दुखद संयोग है कि उनके आदर्श गाँधीजी कि तरह उन्हें भी 4/04/1968 को गोली मार दी गई.
     उनकी एक प्रिय उक्ति थी- " हम वह नहीं हैं, जो हमें होना चाहिए और हम वह नहीं हैं, जो होने वाले हैं; लेकिन खुदा का शुक्र है कि हम वह भी नहीं हैं, जो हम थे. "   
     खुदा का वाकई शुक्र है कि ऐसी कोई गोली नहीं बनी जो इन विभूतियों के विचारों को छलनी कर सके. उस महान अहिंसक सेनानी को नमन.

Monday, February 9, 2009

सवाल गांधीजी का !

नाना- नाना, आपने तो आजादी की लडाई को गौर से देखा है, उसमें भाग भी लिया है। आपने देखा! कल एक पार्टी के युवा नेता कह रहे थे कि- "जब-जब उन्हें किसी समस्या का समाधान नहीं दिखता, वो मेज पर लगी गांधीजी की किताब उठा लेते हैं। " आज एक दूसरी पार्टी के नेता कह रहे हैं कि "गांधीजी का विकास मॉडल सर्वश्रेष्ठ है।"

"तो क्या अब गांधीजी के सपनों का भारत बनाने के लिए सभी मिलकर काम करेंगे?"

आप चुप-चाप मुस्कुराते हुए खिड़की से बाहर क्यों देख रहे हैं, कुछ बोलते क्यों नहीं! भविष्य की ओर देख रहे हैं या कहीं अतीत की किसी पुरानी याद में खो गए?

Friday, January 30, 2009

गांधीजी के साथ- गावों की ओर

भारत की आत्मा गावों में बसती रही है, मगर आजादी के बाद अर्थव्यवस्था का केन्द्र शहरों को मान विकास के मॉडल को अपनाया गया, जिसने देश की जड़ें खोखली कर दीं। यही कारण है कि आज विश्व के किसी दूसरे कोने में चले एक झोंके से भी हमारी विकास की ईमारत लड़खडाने लगती है।

भारत की आत्मा को आत्मसात करने वाले गांधीजी ने कहा था कि- " अब तक गाँव वालों ने अपने जीवन की बलि दी है ताकि हम नगरवासी जीवित रह सकें। अब उनके जीवन के लिए हमको अपना जीवन देने का समय आ गया है। ... यदि हमें एक स्वाधीन और आत्मसम्मानी राष्ट्र के रूप में जीवित रहना है तो हमें इस आवश्यक त्याग से पीछे नहीं हटना चाहिए। " "भारत गावों से मिलकर बना है, लेकिन हमारे प्रबुद्ध वर्ग ने उनकी उपेछा की है। ... शहरों को चाहिए कि वे गावों की जीवन-पद्धति को अपनाएं और गावों के लिए अपना जीवन दें। "

गांधीजी के विचारों को ही उनकी विरासत मानते हुए ग्रामोत्थान और 'ग्राम स्वराज' की दिशा में हमारा अंशदान ही उस महानात्मा के प्रति हमारी विनम्र श्रद्धांजलि होगी।

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